February 19, 2012

ग़ुलाम राजा- अश्वनी

देह मानचित्र सी
अपनी अपनी जगह घेरे अंग प्रत्यंग
स्वामी दिल
प्रहरी मस्तिष्क
शिराओं सी नदियाँ जोड़ती सबको परस्पर...

कोई आके तोड़ दे ये
व्यवस्था
अस्त व्यस्त कर दे मानचित्र
झुलसा दे देह
दमका दे देह
निखरा दे देह
सुला दे प्रहरी को
नदियों को डुबो दे पाताल में
और
स्वामी को बना ले अपना ग़ुलाम....

'उसकी' ग़ुलामी में दिल बल्लियों उछलता है
अहम् टूटता है तो वहम बिखर जाता है
हर दिल की कोई एक रानी
कोई एक राजा होता है..
दिल ग़ुलामी में हरदम जवान रहता है...

'स्वामी दिल' अकेलेपन का शिकार होता है
जल्दी बुढ़ा जाता है
अहम् वहम उसको झुकने नहीं देते
तनी अकड़ी गर्दन एक दिन भरभरा के ढह जाती है...

उम्र बीतने पे आई समझ, नासमझी है
जिनके पास अभी भी वक़्त बचा है
वो मेरे अनुभव से लाभ पाएं
दिल को किसी का ग़ुलाम बनाएं
इस बाज़ी में शह से ज़्यादा मज़ा मात में आता है
हथियार उठाने से
अधिक सुखद है समर्पण
तन-ने से बेहतर है बिछ जाना
अकड़ से अच्छी है पकड़...

इसलिए यहाँ कवितायें पढ़ने में समय ना गँवा के
कविता को खोजो
या
स्वयं बन जाओ कविता...

February 18, 2012

भोला दिल - अश्वनी

घर घर जा के हिंदी साहित्य की किताबें बेचता
कंधे पे टाँगे झोला
वो भोला..
मुंबई में सिर्फ खाने और शराब की होम डिलीवरी ही नहीं होती..
एक फ़ोन पे साहित्य भी घर आता है..
10 % की छूट पे..
हर बार सोचता हूँ एक-दो से ज़्यादा किताबें नहीं लूँगा..
क्योंकि भरा है घर पहले ही अत्यधिक किताबों से..

किताब रखने की जगह नज़र ही नहीं आती..
पर हर बार भोले का झोला आधा खाली हो जाता है..
और घर में जगह निकल आती है किताबें रखने की..
दरअसल यह जगह पहले मेरे दिल में बनती है..
फिर मेरा दिल बना लेता है थोड़ी जगह घर में भी..
दिल के अनोखे तहखाने हैं
जितने खोलो
उतने बढ़ते जाते हैं..
मेरा दिल मेरी सोच समझ को चित कर देता है
हमेशा...

February 17, 2012

यात्रा पात्र - अश्वनी

पिछली 6 फरवरी से 15 तक एक यात्रा में था..
इन 10 दिनों में खूब पैदल चला..
घूमने लायक जगहों पे घूमा..
लगभग हर रोज़ सुबह जल्दी उठा..
शाम थक के मालिशें करवाई..
तरह तरह की बीअरें पी..
झींगा,केकड़ा,बड़ी छोटी मछलियाँ
और तरह तरह के मांसाहारी शाकाहारी खाने खाए..
स्वादिष्ट अनोखे फल खाए..
बकरी का बोतलबंद दूध भी पीने मिला..
कभी तीखी मिर्ची से जीभ जलाई
कभी फल मिश्रित आइसक्रीम से ठंडक पाई..
सब था पास..
पर तीसरे चौथे दिन से ही घर की दाल रोटी बेतरह याद आने लगी..
मैं थाईलैंड में था.. 

February 5, 2012

करता क्यों ना मरता ? - अश्वनी

अधमुंदी आँख
बोझिल तन
घायल मन
दिमाग चौकन्ना

कर्मठ मैं
बढ़ते कदम
सामने मंजिल
दिल उदास

भरी जेब

खनखन सिक्के
बैंक बैलेंस
हाथ खाली

भरा परिवार

होम स्वीट होम
सब सुख
सब में तन्हा

नरम बिस्तर

धुली चादर
गागर में सागर
करवट रात

प्रशंसा भरपेट

उज्जवल भविष्य
बढ़ते आलिंगन
अछूती आत्मा

बाधा दौड़

निपुण धावक
गोल्डन ट्रॉफी
पस्त विचार

छप्पन भोग

लपलप जीभ
मुंह में पानी
मरी भूख

लम्बी गाड़ी

कॉस्टली शोफर
टंकी फुल
टायर पंचर

उत्साह जीवन

आँखों सपने
रेल ज़िन्दगी 

अझेल ज़िन्दगी

बिकता लेखन

डेली सोप
जम के पैसे
कौन कविता ?

दिमाग चौकन्ना
दिल उदास हाथ खाली सब में तन्हा करवट रात अछूती आत्मा पस्त विचार मरी भूख टायर पंचर अझेल ज़िन्दगी कौन कविता?

सुसाइड नोट.......
मुंह से झाग........


नोट- ऊपर लिखी सब घटनाएं काल्पनिक हैं..इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है..यदि आपको किसी के भीतर ऐसे लक्षण दिखें..तो वो महज़ एक संयोग है..

February 4, 2012

हर बार कविता नहीं होती - अश्वनी

अभी मैं कहने जा रहा हूँ कुछ ऐसी बातें 
जो बिलकुल साधारण हैं..
ऐसी बातें हर किसी के ज़हन में आती हैं..
ऐसे शब्द..ऐसी सोच..हर किसी के पास होती है..
इसमें कुछ भी नहीं है कविता जैसा..
पर धोखे से मंच पे चढ़ आए कवि की तरह 
अपनी बात कहके ही जाऊँगा..

काम में दिन रात डूब के पार उतरना निर्वाण है..
किसी को मोहब्बत में पा जाना खुदाई है..
लम्बी दौड़ में सुस्ताना रूहानी है..
प्यास में पानी अमृत है..
भूखे को रोटी जहान है..
धूप में साया सुकून है..
ना के बाद हाँ आनंद है..
यथार्थ में सपने प्राण हैं..
जीवन बाद मौत शान्ति है..
तेरे बिना जीवन मौत है..

देखा..मैंने कहा था ना
इसमें कुछ भी नहीं है कविता जैसा...

February 1, 2012

नो कविता डे - अश्वनी

जब मैं कवितायें लिख रहा होता हूँ तो समझ जाइए 
कि मैं उन दिनों में एक भी पैसा नहीं कमा रहा हूँ..
जब कविता पास होती है तो पैसा दूर भागता है...
जब पैसा कमाता हूँ तो कविता पास नहीं आती..
हालाँकि मैं लिख के ही पैसा कमाता हूँ..
पर वो लिखना अलग होता है..
उसमे सब कुछ होता है..
पर कविता नहीं होती..
मैं आजकल फिर से पैसा कमाने के लिए लिख रहा हूँ..
और कविता दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रही..
एक ही सवाल है मेरा आजकल..
ये लक्ष्मी और सरस्वती कभी हाथ मिलायेंगी क्या??

January 30, 2012

मेरे सवालों का जवाब दो..दो ना - अश्वनी

क्या आपको पता है?
केवल कॉकरोच रहेंगे जिंदा..
जब सब होंगे मुर्दा..

पर उस वक़्त क्या जिंदा होगा सच?
या झूठ बोल रहे होंगे कॉकरोच भी?
उस वक़्त भाई,भाई का गला काटेगा??
या वो सीख जायेंगे भाईचारे से रहना?

उस वक़्त भी क्या रूपया होगा सबका बाप?
या कॉकरोच बेकाम की वस्तु समझ के नकार देंगे उसको?
क्या उस वक़्त हो रहे होंगे प्रोपर्टी के झगड़े? 
या कॉकरोच मिल के रह रहे होंगे एक ही भूखंड पे?
उस वक़्त क्या हो रही होगी इन्फिडेलिटी?
या कॉकरोच सीख जायेंगे मोनोगैमी?

क्या उस वक़्त तक कॉकरोच समझ चुके होंगे कि 
इंसान था अजीब प्राणी..
जो जिंदा था..लड़ता था..मरता था..और मर गया..
ज़र जोरू ज़मीन पे... 

जो बात कॉकरोच समझेंगे हमारे जाने के बाद..
हम वो बात जीते जी समझ लें?
मैं सवाल बहुत पूछने लगा हूँ आजकल..
मुझे माफ़ करना..
पर जब बरसों से जवाब ना मिलें हों तो बहुत से सवाल हो जाते हैं इकट्ठा..

January 29, 2012

सोच लो - अश्वनी

इतनी भीड़ इतने लोग इतने चेहरे इतने चरित्र 
भगवान के पास मिट्टी है अनंत..
पर ओवरटाइम करना पड़ रहा है उसको भी
दिन रात काम में जुट के भी सप्लाई पूरी करना हो रहा है मुश्किल..

डिमांड बढ़ती ही जा रही है..
सबसे ज़्यादा आर्डर इंडिया से आते हैं..
क्वांटिटी के चक्कर में क्वालिटी गिर रही है..
औसत दर्जे के भारतीय बनाने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं.. 
अव्वल दर्जे के लिए लगता है धैर्य और समय 
पर ना नीचे समय है लोगों के पास..
ना ऊपर उसके पास..

कई बार तो किसी विशेष तिथि को अचानक ओवरलोड हो जाता है कारखाना..
11.11.11 या 12.12.12 जैसी तिथियों पे पैदा होने के लिए नीचे मचती है होड़..
तमाम कुदरती गैर-कुदरती तरीकों से लाये जाते हैं नवजात दुनिया में..
उस दिन ऊपर पानी पीने की फुर्सत भी नहीं मिलती उसको..
उन दिनों में शायद वो हायर करता है थोड़े कम अनुभवी देवता..
जो जैसे तैसे गढ़ कर भेज देते हैं पुतले..

अबे इंसानों..
इतना ज़्यादा काम लोगे बेचारे से तो एक दिन सब्र का प्याला छलक जाएगा उसका..
उस दिन वो उठा के बहा देगा सारी मिट्टी..
तोड़ने लगेगा अपने बनाए मिट्टी के पुतले..

एक अफवाह भी गरम है कि दुनिया खत्म होने वाली है..
मैं डरा नहीं रहा,चेता रहा हूँ
सोच लो.. 

कुदरत - अश्वनी

बारिश में नहाए बहुत दिन हुए..
तन मन भिगोए बहुत दिन हुए..
सराबोर हो छींक मारे बहुत दिन हुए..
भीगे तन में चाय चुसके बहुत दिन हुए..
जबसे रहने लगी छतरी संग-संग..
बारिश का उड़ गया रंग.. 

आंधी देखे बहुत दिन हुए..
धूलम-धूल हुए बहुत दिन हुए..
नैचुरल पाउडर लगाए बहुत दिन हुए..
कपड़े झाड़े बहुत दिन हुए..
जब से चढ़ गया आँखों पे चश्मा..
आंधी का हुआ खात्मा..

जाड़ा पाला महसूसे बहुत दिन हुए..
हाथ जेबों में घुसाए बहुत दिन हुए..
आग तापे बहुत दिन हुए..
दांत किटकिटाये बहुत दिन हुए..
जब मोटी हो जाए खाल..
जाड़े का कहाँ सवाल..

बारिश आंधी जाड़ा लू हिमपात बसंत पतझड़ 
इनको देखने जानने सुनने महसूसने 
खुद को मिटाना होगा

अपने आप से नज़र हटेगी..
तभी तो कुदरत दिखेगी..

January 28, 2012

चलें?-अश्वनी

धुंध के पार..चलोगी मेरे साथ?
रोशनी पे सवार..चलोगी मेरे साथ?
मुश्किलें हैं तैयार..चलोगी मेरे साथ?
सह हर वार..चलोगी मेरे साथ?
पूँजी केवल प्यार..चलोगी मेरे साथ?
काँटों भरी बहार..चलोगी मेरे साथ?
न मोटर न कार..चलोगी मेरे साथ?
रोटी विद अचार..चलोगी मेरे साथ?
संघर्ष मेरा संसार..चलोगी मेरे साथ?
विजेता हो, अब सब हार...चलोगी मेरे साथ?

दिन गिनती के चार..चलो ना मेरे साथ..
मुझे करती तो हो प्यार..चलो ना मेरे साथ..
मुझे आता रोज़ बुखार..चलो ना मेरे साथ..
सीने पार कटार..चलो ना मेरे साथ..
गिरा दी हर दीवार..चलो ना मेरे साथ..
खूब करेंगे प्यार..चलो ना मेरे साथ..
दिल में बजी गिटार..चलो ना मेरे साथ..
ग़लती की स्वीकार..चलो ना मेरे साथ..
इन्तहा हुआ इंतज़ार..चलो ना मेरे साथ..
मान जाओ ना यार..चलो ना मेरे साथ.. 

जंगली- अश्वनी

मुझे जंगल देखे कई दिन हो गए
मैंने कई दिन से अपने भीतर नहीं झाँका
काई जम गयी है वर्षावन में
मेरे मन में...

एक वन-नदी तोड़ चुकी है सांस
सूखी पपड़ी सी पड़ी है मुर्दा
मछलियों के कंकाल मुकुट से सजे हैं पपड़ी पर
मेरी धमनियों का रक्त जम के हो चुका है काला
मेरी शिरायें सूखे नूडल सी लटक रही हैं
त्वचा से बाहर झाँक रही हैं नसें

कांटे उगे हैं जगह-जगह जंगल में
छील देते हैं जो
लील लेते हैं जो
मेरी जीभ रेगमार हो गयी है
जख्म देती है
घायल कर देती है
कभी तुझे, कभी मुझे

सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता इस अरण्य में
इतना घना है ये
मेरी आत्मा को कोई छू नहीं पाया अभी तक

विषैले-वनैले जीव-जंतु भरे पड़े हैं इस कानन में
छेड़ते ही काट लेते हैं
मेरी हस्तरेखाओं में वध की पुष्टि हुई है

जंगल में आग लग गयी एक दिन अचानक
सारे वन-कानन पे कालिख पुत गई
अरण्य नगण्य हो गया
उस रात मेरे हाथ से कुछ लकीरें गायब हो गईं
मन हर्षित और वाणी मधुर हुई मेरी
मुझे कोई लगने लगा बेहद प्यारा
मैं उसी के साथ जंगल-सफ़ारी पे जाने वाला हूँ।

January 27, 2012

राजकुमारी की कविता-अश्वनी

कवितायें पढ़-सुन कर मेरी
एक देश की राजकुमारी हो गयी फ़िदा...
विवाह का आदेश आया सन्देश के रूप में..
ऑफर अच्छा था..
विवाह करने पे राजकुमारी के साथ राज-पाट भी मिलेगा..
P.T.O लिखा था सन्देश के कोने में..
पलट के देखा तो एक शर्त भी चस्पां थी..
शर्त थी कि मुझे हर रोज़ सुनानी होगी एक कविता राजकुमारी को..
सन्देश और शर्त दोनों आदेश थे..
सो मान लिए..
विवाह हुआ..कविताई भी शुरू हो गयी..
राज-पाट मिला..
सीधा-सादा सा मैं तीर सा तन गया..
सर झुके नौकर से अकड़फूं राजा बन गया..
जब सत्ता सर चढ़ने लगी तो कविता दिल से उतरने लगी..
एक कविता कहना एक समंदर लांघने जैसा हो गया..
इसी राजमद की भूल-भुलैयां में एक दिन मैं बिना कविता कहे सो गया..
सुबह मुझे ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया राजकुमारी ने..
अगले दिन से राजकुमारी कवितायें पढ़ने-सुनने लगी नए कवियों की
सुना है उसे एक नए कवि की कवितायें पसंद आने लगी हैं..
राजकुमारी के कारिंदे एक नयी दीवार के लिए ईंट-गारा जुटाने में लग गए हैं..

भूत-अश्वनी

हर तरह की यादों का एक वक़्त और दिन होता है..
आज मैं फुर्सत में हूँ
और मुझे अपने बचपन की
पुराने दोस्तों की
छूट गए छोटे से कस्बे की
उस छोटे से कस्बे में हमारे बड़े से घर की
यादें घेरे हुए हैं...

जब मैं भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में होता हूँ 
तब इस तरह की नॉस्टैल्जिक टाइप 
यादें मेरा साथ छोड़ देती हैं..
तब मुझे याद रहता है 
मिल्खा सिंह से भी तेज़ भागता समय
और सुरसा-सा मुंह फाड़े बचा ढेर काम...
भविष्य बेहतर करने में वर्तमान बर्बाद करना 
मैं कभी नहीं भूलता उस समयकाल में...

उस वक़्त मेरा मशीनीकरण हो चुका होता है...
मेरे पूरे जिस्म पे नट-बोल्ट उगे जाते हैं
और मेरा बॉस पेचकस हाथ में ले के 
कुटिल मुस्कान लुटाता है..
ज़रा सा भी ढ़ीला पड़ने पे 
वो मेरे पेच कस देता है..

उस वक़्त मुझे याद कराने पे भी याद नहीं आता कि
मैं कभी बच्चा भी था..
और मैं कहता पाया जाता हूँ 
कि मेरे कभी कोई दोस्त ही नहीं रहे

उस वक़्त मुझे यकीन होता है 
कि मैं जन्म से ही इस महानगर में हूँ..
और यह दड़बेनुमा घर ही मेरा घर है सदा से..

उस वक़्त अगर मुझे दुनिया के मानचित्र से मिटा दिया जाए
मतलब मेरी हत्या हो जाए 
या फिर स्वाभाविक मौत
तो
किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा..
सिर्फ़ मेरे बॉस को थोडा दुःख होगा 
समय की हानि होने का..
उसे एक दिन का अवकाश रखना पड़ेगा मजबूरी में..

किन्तु एक दिन बाद
कोई छोटे कस्बे के बड़े घर से आया 
लड़का
जिसके कई दोस्त हैं
और जो अभी भी बचपन, कस्बे
और दोस्तों को याद करता है...
मेरी जगह ले लेगा..

फिर मेरा बॉस उसको बताएगा
की उससे पहले उसकी जगह काम करने वाला
हमेशा खोया सा रहता था कुछ यादों में
इसलिए वो नहीं कर पाया
अपना काम सुचारू रूप से..
अगर ऊपरवाला उसको निकाल के न ले जाता
तो वो खुद ही उसे निकालने वाला था नौकरी से..
इसलिए बेटा...याद रखना..
यादों में मत खोना यहाँ..
दिल लगा के, नज़र झुका के काम करना..
उसके बाद तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है..

जिस वक़्त मेरा बॉस 
मेरे जैसे एक छोटे कस्बे से आये 
नए लड़के को ज्ञान पिला रहा होगा..
उस वक़्त मैं भूत बनके 
अपने छोटे से कस्बे के बड़े से ख़ाली पड़े घर में 
अपने पुराने दोस्तों को याद करके भटक रहा होऊंगा...

January 25, 2012

हूम हूम दिल-अश्वनी

इस कविता में हैं
कुछ छोटी-छोटी कवितायें...
किसी का किसी से 
कोई सीधा सम्बन्ध नहीं..
सिवाए इसके कि...
यह सब मेरे दिल की आवाजें हैं..

प्रेम को रजाई सा ओढ़ा...
गर्माहट से भर गया अंतस..
रजाई ओढ़ के जीवन बिताना....
नामुमकिन है...

एक उधेड़बुन साथ है आत्मा के..
हर समय सालती..
यह उधेड़ बुन...
आत्मा को उधेड़ देती है...

अपनी बचपन की तस्वीर देख के...
अक्सर ये होता है..
खुद को आईने में देख के..
अच्छा नहीं लगता...

माँ ने अब तक
मेरे बचपन के कपड़े संभाल रखे हैं..
वो एक बार मेरे बच्चों को...
वो कपड़े पहने हुए देखना चाहती है..
क्या मैं भी संभाल के रखूंगा 
अपने बच्चे के बचपन के कपड़े?
पता नहीं क्यूँ...
पर मैं एक बार
माँ से लिपट के खूब रोना चाहता हूँ...

मेरे पिता 20 साल बूढ़े हो गए हैं पिछले 10 सालों में..
उनकी बूढ़ा होने की दर
दोगुना हो गयी अचानक...
पिता को अपनी आँखों के सामने 
अपने बच्चे को बढ़ता देखना भाता है..
पर बढ़ चुके बच्चे के लिए
पिता को बूढ़ा होते देखना विवशता है..
मैं एक बार अपने पिता को 
यह बोलना चाहता हूँ कि
मैं उन्हें बेहद प्यार करता हूँ...

मेरा भाई मेरा दोस्त है 

वो वैसा दोस्त है 
जो भाई जैसा होता है...
वो घुमक्कड़ है..
मैं उसके साथ
एक लम्बी यात्रा पे जाना चाहता हूँ...

जब पत्नी मेरे दुःख से दुखी
और मेरे सुख में सुखी होती है
तो अक्सर सोचता हूँ
कि यूँ ही अर्धांगिनी नहीं कहते उसको...
अर्धांग बनके वो...
करती है मुझे पूर्ण..
मैं उस से पहले या उसके साथ
इस दुनिया से जाना चाहता हूँ..
मुझसे पहले उसका जाना मैं नहीं देख पाऊंगा...
कसम से...

January 24, 2012

सपनों से भरे नैना..न नींद है न चैना-अश्वनी

अगर मैं अपने सपनों की रिकॉर्डिंग कर पाता..
तो मैं आज एक बहुत बड़ा कहानीकार..उपन्यासकार,कवि होता..
सपनों में इतनी कहानियाँ..इतनी कवितायें रचता हूँ कि सपने में मुस्कुराता रहता हूँ..
कभी-कभार कोई कहानी आ के रुला भी जाती है..कोई हंसा जाती है..कोई डरा जाती है..
पर कहीं न कहीं मुझे पता चल जाता है कि यह एक सपना है..
तो मैं मुस्कुराने लगता हूँ..
क्योंकि मुझे पता होता है कि मैं रच रहा हूँ कोई बड़ा साहित्य..
बस केवल एक रहस्य मैं नहीं जान पाता सपने का..
कि जो मैं रच रहा हूँ..यह सब एक जादुई स्याही से लिखा जा रहा है...
जो स्याही सुबह होते ही गायब हो जायेगी मेरी याद के पन्नों से..
ज्यादा सोचते रहने का नतीजा है यह सारा..
दिन भर सोचो और रात में सपने देखो..
पेट भर सपनों से भरी नींद साउंड स्लीप नहीं होती..
मेरे सपने मेरी नींद खा गए हैं पिछले कुछ सालों से..
मैं साहित्यकार तो नहीं ही बना..
हाँ..अनिद्रा का शिकार हो गया हूँ..
अब केवल एक तमन्ना है..
या तो सपने रिकॉर्ड होने लगें..

या सपने समाप्त हो जाएँ..
या मैं सोचना बंद कर दूं..
या....

January 22, 2012

मैंने खुद को देखा-अश्वनी

बंद कमरे में घुसा मैं घरघुसरा अँधेरे में भी देख लेता हूँ आजकल..
बाहर धूप और रोशनी है..इसका इल्म है मुझे..
कल्पना में मैं दरवाज़ा लांघ के बाहर पहुँचता हूँ..
धूप को अपनी मुट्ठी में कैद करता हूँ..
जब जब मैं ऐसा करता हूँ तो..
घर के भीतर मेरी हथेली पता नहीं क्यूँ गरम हो जाती है..
घर के भीतर मैं अकेला हूँ..
मैं घर के बाहर नहीं हूँ..
कल्पना एकमात्र पुल है मेरे और बाहर के बीच..
मैं भीतर बैठा अपने को बाहर देख रहा हूँ..
मैं एक भूखे भिखारी बूढ़े के पास खड़ा हूँ..
मैंने उसके हाथ में चार रोटियाँ और आलू गोभी की सूखी सब्ज़ी रखी..
शाम को खाना खाने रसोई गया तो चार रोटियाँ और आलू गोभी की सब्ज़ी गायब मिली...
भूखे आदमी को गुस्सा ज्यादा आता है..
मैं भूखा था और खूब गुस्से में था..
मुझे लगा कि मुझे खुद को खुद की कल्पना में देखना नहीं चाहिए था..
अगर वास्तविकता में होता तो मैं खुद भूखा रह के किसी दुसरे भूखे का पेट कतई नहीं भरता..
ज़्यादातर ऐसा ही है..हमारा काल्पनिक रूप हमारे वास्तविक रूप से अधिक सुंदर है..
काश यह सब एक कल्पना लोक होता..फिर ना मैं घर के भीतर घरघुसरा बनके पड़ा होता..
ना मुझे अभी गुस्सा आ रहा होता..ना मुझे अपनी भूख इतनी ज़्यादा परेशान करती..
और ना ही कहीं कोई बूढ़ा भूखा भिखारी होता..और ना ही मुझे यह सब लिखना पड़ता..

और यदि आप जो यह सब पढ़के हल्की सी सोच में पड़ गए हैं शायद..
वो क्यूँ पड़ते भला...

January 20, 2012

क्यूँ से शुरू होते सवाल-अश्वनी

इतनी कशमकश..इतनी कसमसाहट..इतनी बेचैनी..इतना शोर..इतनी व्याकुलता..
क्यूँ कोई चैन सुकून आराम ख़ामोशी का दरवाज़ा नहीं खुलता?
क्यूँ धुकधुकी सी सीने में..क्यूँ रोज़ एक मरण रोज़ के जीने में?
क्यूँ चाह इतनी बढ़ी कि खुद छोटे नज़र आने लगे हम?
क्यूँ प्यास इतनी ज़्यादा कि सागर भी लगे कम?
क्यूँ पैर इतने बड़े कि हर चादर लगे छोटी?
क्यूँ स्वाद इतना सरचढ़ा  कि बेस्वाद लगे रोटी?
क्यूँ सीढ़ियों के चढ़ने में ज़िन्दगी उतरे जा रही कब्र में?
क्यूँ बेसब्री सबब बनी जीने का..क्यूँ मज़ा आता नहीं सब्र में?
क्यूँ प्रतिस्पर्धा घुल गयी खून में?
क्यूँ सर घूमता रहता व्यर्थ के जूनून में?
सबके अपने अपने सवाल हैं..सबके अपने अपने क्यूँ हैं..
मेरे भी बहुत से क्यूँ बचे हैं बाकी..
पर अभी इतने सारे क्यूँ से भरे सवाल पूछ कर मैं उदास हो गया हूँ..
मैं चला सोने..

January 17, 2012

चल कहीं दूर निकल जाएँ-अश्वनी

प्यार पर इतना लिखा-कहा-सुना जा चुका है...
अब मैं और क्या लिखूं ?
रिश्तों पर इतना देखा-सुना-पढ़ा है..
अब मैं और क्या कहूं?
भावनायों-जज्बातों की बातों का तो कहना ही क्या..
स्वेटर की तरह,एक सिरा पकड़ो तो पूरे के पूरे उधड़े नज़र आये हैं हमेशा..
मैं कौन से नए जज्बातों की करूं बात??
राजनीति,देश,गरीबी,शोषण,भ्रष्टाचार पे लिखने वाले हैं हज़ार..
मैं क्यूँ उनकी भेड़-भीड़ में हो जाऊं शामिल??
धर्म-कर्म,माया-मोह,लोभ-लालच,क्षोभ-कुंठा,पिपासा-वासना पे कह-कह के लोग थक ही नहीं रहे हैं..
और मैं इन पर लिखने के विचार से ही थक जाता हूँ..
जीवन-मरण,भगवान-शैतान,अच्छा-बुरा,खरा-खोटा,सच्चा -झूठा..
इसपे तो कोई भी कह लेता है आजकल..
मैं इसपे लिख के अतिसाधारण लोगों में क्यूँ लिखवाऊं अपना नाम?
यादें-वादे-इरादे,महबूब की बातें भी हो चुकी हैं खूब..
बड़े बड़े शायर कह गए हैं जो कहा जाना चाहिए था..
और जो कहने लायक था..
मैं अब निम्नस्तरीय लिख के उनके लिखे हुए को क्यूँ करूं शर्मिंदा?
इस धरती पर जो कुछ भी लिखे,कहे,सोचे जाने लायक था..वो हो चुका..
नए विषयो..नए विचारों,नए मुद्दों की तलाश में खोजने पड़ेंगे कुछ नए ग्रह..
या जाना पड़ेगा दूसरी दुनिया में..
जिसे स्वर्ग-नरक..जन्नत-जहन्नुम के नाम से मशहूर कर दिया है कुछ चतुर लोगों ने..
अब तो चिता पे लेट के कुछ नया सोचूंगा या फिर कब्र में उतर कर..

January 14, 2012

सुख की कविता-अश्वनी

मैं सुख की कविता लिखना चाहता हूँ..
आज तक नहीं पढ़ी कोई ऐसी कविता जिसमें सुख ही सुख हो..
हर कोई हो प्रसन्न..ख़ुशी से शुरू हो और ख़ुशी पे ख़तम हो जाए..
तेरे नाम से शुरू..तेरे नाम पे ख़तम टाइप्स...
पर जब ख़ुशी-ख़ुशी लिखने बैठा ख़ुशी और सुख पर कविता..
तो कविता अदृश्य हो गयी और एक गाना मेरे सर पे नाचने लगा..
मेरे पन्नों पे अब एक गीत लिखा है..
मैं अब भी एक सुख की कविता लिखना और पढ़ना चाहता हूँ..
ख़ुशी से शुरू..ख़ुशी पे ख़तम टाइप्स..

January 2, 2012

पुराना माल-अश्वनी

वही दोस्त,वही दोस्तियाँ..
वही मुश्किलें,वही कमजोरियां..
वही उलझाने,वही वादे,वही इरादे..
वही लालसाएं,वही इच्छाएं..
वही डर,वही संकोच,वही आशाएं,वही निराशाएं...
वही आप,वही मैं...
सालोंसाल से यह सालों का चक्र घूम रहा है..
सब कह रहे हैं की नया साल है..
मैं कहता हूँ नयी खाल पहन के यह वही पुराना माल है..

December 23, 2011

खुद की गर्मी से पिघला नज़रिया-अश्वनी

कई दिन से बुखार नहीं उतर रहा..
और मैं दार्शनिक होता जा रहा हूँ..
ये दर्शन स्वस्थ होने पर पास नहीं फटकता..
एक शेर रह रह के याद आता है इन दिनों..
इस सफ़र के वास्ते, इक रोग तू भी पाल ले..
सिर्फ सेहत के सहारे ज़िन्दगी कटती नहीं..
पर मेरे केस में उल्टा है..मैंने रोग को नहीं पाला
रोग ने मुझे पाल लिया है..
उंगलियाँ थर्मामीटर हो चुकी हैं..
खुद का ताप बता देती हैं खुद को छूते ही..
आँख मिचोली खेलता है बदन मेरा तापमान के साथ..
शांत रहने में मज़ा आता है..
दुनिया के लिए जो ज्वलंत मुद्दे हैं...
मेरे लिए बुझे कोयले हैं आजकल..
कोई अनशन पे बैट्ठे..
मेरे ठेंगे पे...
कोई संसद में चिल्लाए...
मेरे ठेंगे पे..
कोई काला धन वापिस लाये ना लाये..
मेरे ठेंगे पे..
एक बात तो है..जैसा भी है..जो भी है..
ये अवस्था अच्छी ही है...
खुद का बदन गरम हो तो गरम मुद्दे भी ठन्डे नज़र आते हैं..
आप क्या कहते हैं??

December 11, 2011

गाली-अश्वनी

रुका था तो चलने को तरसता था..
चला हूँ तो रुकने को तरसता हूँ...
क्यूँ सब कुछ सही अनुपात में नहीं मिलता साला...
भूखे थे तो खाने को तरसते थे..
इफरात में मिला तो भूख ही मर गयी साली..
ठण्ड में एक कपडे को तरसते थे..
गर्मी में रज़ाई ओढ़ा गए लोग साले..
एक बूँद पानी को तरसा दिया था कभी..
अभी नाक से पानी धकेल रहे हैं साले..
गाली देने का कभी शौक नहीं था मेरा कविता में..
पर आप ही बताइए..
ऐसी बीते किसी के साथ तो गाली न निकलेगी मुंह से साला..

October 30, 2011

शायद...अश्वनी

खाया पीया नाचा बहका..
चीखा चिल्लाया चम्भला चहका..
सुना सोचा सीखा दहका..
मना रूठा सोया महका..
पाया लिया दिया लहका..
क्यूँ बहका?
क्यूँ चहका?
क्यूँ दहका?
क्यूँ  महका?
क्यूँ लहका?
बिना वजह..
बेमकसद..
जैसा खिलाया..वैसा खेला..
जैसा रखा..वैसा रहा....
जैसा जिलाया वैसा जिया..
जब हाथ में मेरे कुछ भी ना था तो हाथ में मेरे लकीरें क्यूँ बनाई..
क्यूँ कहा तू ऐसा करेगा...वैसा करेगा..
कर कोई और रहा है..और भर कोई और रहा है...
सब के साथ ऐसा ही होता है..
शायद...

April 10, 2011

धारावाहिक - अश्वनी

ज़िन्दगी रोज़ाना टेलीकास्ट होने वाला चौबीस घंटे का धारावाहिक है 
यह टेलीकास्ट मेरे दिलो-दिमाग की स्क्रीन पे होता है
कभी कभार ही  कुछ एपिसोड्स देखने लायक होते हैं 
वरना..अक्सर वही घिसा पिटा 
हर वक़्त ये प्रयत्न के कुछ हो ऐसा
कि 
यह धारावाहिक बन सके देखने लायक
परन्तु
प्रयत्न..प्रतीक्षा का मज़ा ले लेता है 
ज़िन्दगी के इस डेली सोप में हाथ पे हाथ धर 
आराम कुर्सी पर बैठ  पोपकोर्न खाते हुए 
इस धारावाहिक की कड़ियाँ देखना ख़ास बुरा नहीं 
बशर्ते यदि आप अच्छे अभिनेता हैं
और 
खुद को मुख्य भूमिका में देख के बोर नहीं होते 
तो 
ये सारा जहान मंच है आपका
उछलिए कूदिये ठहाके लगाइए 
और सोच के खुश रहिए की आप निर्देशक भी हैं इसके
पर मेरा यह भ्रम खंडित है 
मैं ये स्वीकार करके जीता हूँ कि
एक कठपुतला हूँ मैं
किसी की उँगलियों में बंधी डोर से संचालित 
निर्देशक कई और हैं मेरे 
और वो सब मुझसे नाराज़ रहते हैं
क्योंकि मैं ज़िन्दगी के इस धारावाहिक में अच्छा अभिनय भी नहीं कर पाता..

November 21, 2010

गुर-अश्वनी

कंप्यूटर के सामने बैठ कर..
उँगलियों के पोरों से टाइप करते हुए...
आँखों से सही अक्षरों को तलाशते हुए..
और दिमाग से लगातार कुछ सोचते हुए एक्टिव रहने से भी कविता नहीं होती...
आँखें बंद करके...
उँगलियों को जेब में डाल के...
दिमाग को मेरिनेट करके रेफ्रिजरेटर में रख के...
कुछ पल दिल से अपने साथ रहो तो कविता होने लगती है...
कर के देखो...अच्छा लगता है...

November 9, 2010

यक्ष प्रश्न-अश्वनी

दम साध के बैठे रहे...कलम साध लेते
दिल थाम के बैठे रहे...हाथ थाम लेते
बहुत कहते रहे अपनी...हमारी भी सुन लेते
घात लगाए बैठे रहे... हथियार डाल देते
दौड़ते रहे सरपट...विचार कर लेते
जागते रहे आँख फाड़े...सपने देख लेते
गिनते रहे हमेशा...मुट्ठी खोल देते
बेखबर रहे बेचैन...करुणा भर लेते
खोजते रहे हमेशा...ध्यान कर लेते
संचयी कंजूस बन गए...फक्कड़ बन जाते
खुंदक पालते रहे...प्यार कर लेते
सीमाएं बनाते रहे...लांघ भी लेते
सोचते ही रह गए...कर भी लेते
आँखें मूंदे पड़े हो अब...ज़िन्दगी जी लेते।

August 7, 2010

हिसाब किताब-अश्वनी

आँखें खुली रखने कि कोशिश में बहुत देर आँखें रगड़ी तो आँखें लाल हो गयी ...
नींद से लड़ना कभी सुख देता है कभी दुःख...
रात भर जागना कभी सुकून देता है कभी बेचैनी ....
मैंने सुकून पाने के लिए बेचैनी में रात काट दी..
मैंने सुकून पाने के लिए  बेचैनी में उम्र काट दी...
मैंने दूसरों से लड़ते हुए खुद  के सामने हथियार डाल दिए...
मैं दूसरों की नज़रों में शेर रहा...अपने  सामने बिल्ली...
मैं दूसरों के सामने स्वस्थ रहा..खुद के सामने घायल...
मैं दूसरों को ज़िन्दगी समझाते समझाते खुद मौत को समझ गया...
मैं दूसरों को ज्ञान बांटते बांटते खुद रिक्त हो गया...
मैं प्यार की परिभाषा बताते बताते खुद नफरत से भर गया...
मैं दूसरों को पाते पाते खुद को खो आया...
मैं अब हिसाब किताब लगाने बैठा हूँ कि क्या खोया क्या पाया...
यह हिसाब किताब मरने तक लगे रहते हैं..
आप क्या कहते हैं..

August 5, 2010

खोखल-अश्वनी

पल-पल जमा किये मैंने...
इक दिन भरने के लिए...
दिन भरा-भरा सा ही लगा ऊपर से...
पर जब परतें उधड़ी पलों की तो हाथ आये कुछ खोखल...
पर सारे पल खोखल नहीं थे...खोखल के बीच-बीच भी था कुछ भरा-भरा...
भरे हुओं में कुछ खाली और खाली में कुछ भरे हुए रहते हैं...
मुझे लगता है ये सब आपकी मनःस्थिति पे निर्भर करता है॥
आप क्या कहते हैं..

July 4, 2010

शाम-अश्वनी



शाम इक नदी..
शाम इक समंदर....
मैं शाम में डूबा हुआ...
शाम डूबी मेरे अन्दर...


जब शाम आए, ख़ामोशी दे जाए


शाम की इंतज़ार में शाम हो गयी..पर जो शाम हाथ आई ..वो दोपहर साथ लायी

जब जम के बरसा जल......मैंने खिड़की पे शाम बिता दी...
मेरा वजूद इक रात सा...मेरी आहट सुबह हुई....मेरी महफ़िल इक दोपहर सी...मेरी तन्हाई शाम हुई॥

सुबह मेरी नींद है...रात मेरी करवट...दोपहर मेरी दुश्मन..और शाम मेरा घर॥

सुबह मिली...दोपहर खिली... रात पास बैठी रही... पर शाम खो गयी...
चैन भी मिला कभी... आराम की दो घड़ियाँ भी बिताईं... सुकून से भी बैठे रहे कुछ पल... पर नींद खो गयी।

June 5, 2010

आत्मबोध-अश्वनी

जीना झीना झीना....

मरना सघन सघन......

करना कुछ छ्लावा छ्लावा......

ना करना मगन मगन.....

पाना है इक प्यास....

ना पाना लगन लगन...

June 2, 2010

क्या-अश्वनी

क्या लिखें .......

क्या सुनाए.......

क्या करें बयां.........

इतने दिन बीते कह्ते कह्ते....

अब भी कुछ बाकी रहा है क्या.....

उदासी-अश्वनी

जब दिल उदास हो तो उदासी का मज़ा लो....

जब खुश हो दिल तो उदासी खोजने निकल पढ़ो...

उदासी स्थाई भाव बन जाए तो ऐसे विचार अक्सर आते जाते रह्ते हैं....

आप क्या कहते हैं...

डगमग इरादे-अश्वनी

कैसे करें वादा .......

जब डगमग हो इरादा ....

जब डगमग हो इरादा तो कैसे करें वादा...

गुनाह अभी चंद कर लेने दो मुझको .....

कर लेंगे हिसाब भी इक दिन....

कम किये या ज़्यादा....

हालाते हाज़रा-अश्वनी

नींद बहुत आती है...
नींद नहीं आती है....
बात होंठों पे आती है...
बात दिल में रह जाती है...
समझ जाता हूं हर बात कभी....
कभी समझ ही नहीं आती है.....
याद, प्यास, तड़प, जुदाई, प्यार
ये सब सिर्फ शब्द हैं कभी.....
कभी-कभार शब्दों के भीतर बसी रूह नज़र आती है..

March 5, 2010

जिद्दी जिद्दी-अश्वनी

मेले लगे हैं...
मगर आज हम फिर से अकेले चलें हैं...
भीड़ से हटके चलने कि आदत पुरानी है...
अब इस आदत को जिद में बदलने चलें हैं

March 1, 2010

भ्रमित-अश्वनी

निकला था घर से
सोच के कुछ कि इधर जाऊंगा
उधर जाऊंगा
अभी आके जहां पहुंचा हूँ
समझ नहीं आता
कहाँ हूँ ...
किधर जाऊंगा
कभी मंजिल ने छला..
कभी रस्ता निकला मनचला
कभी पता चला
कभी नहीं
बहुत सोच समझ के यात्रा शुरू करो तो भटकने के चांसेस ज्यादा रहते हैं...
आप क्या कहते हैं??

चंद चिन्दियाँ-अश्वनी

आज फिर कुछ लिखने का मन है...
आज फिर दिल से अपने बातें कि जायेंगी...
आज फिर कोई नई बात लगेगी पता....
आज फिर मुझे देर से नींद आएगी।


आज सपने देखे जायेंगे कुछ हसीं
आज साथ चंदा सूरज खिलेंगे कहीं
आज बिन मौसम बारिश भी होगी
आज मस्त मोर,बस्ती में नाचेगा कहीं

January 28, 2010

एक अधूरी कविता-अश्वनी

उत्तेजना है कुछ ...कुछ ठंडापन है
जिज्ञासा है कहीं..कहीं तटस्थता भी है
निश्चिन्तता है कभी..कभी चिंतामगन हूँ
दूरदृष्टि प्राप्त होती कभी..कभी सब कुछ धुंधला धुंधला
अहसास होता हर आहट का कभी ...कभी कुंद पड़ जाती हर संवेदना

December 31, 2009

प्लीज़-अश्वनी

उथल पुथल कर दूं सब
पटक पछाड़ दूं सब
राख कर दूं
ख़ाक कर दूं
आग लगा दूं
मिटा दूं जो था अब तक
इस समय है जोश पूरा
खो रहा हूँ होश थोड़ा
सांस ही है साथ मेरे
कोई नहीं है पास मेरे
पास अँधेरे ,दूर सवेरे
सांस की बस थाम डोर
मैं चला अनजान छोर
रात मिलेगी या कि भोर
खुद की बात,खुद की रात,खुद का हूँ मैं खुद ही चोर
यह मेरे दिल का बवंडर ,दिल ही खाली ,दिल समंदर
दिल ही चोर,दिल की भोर,दिल ही ओर,दिल ही छोर
दिल ही दिल्ली,दिल बम्बई,दिल कोल्कोत्ता,दिल बंगलोर
क्या करूं मैं अपना,उसका,इसका,तेरा,सबका....
एक दिल,एक जान....
टंटे लाखों,लफड़े हज़ार
मुझे माफ़ करो
एक लाइफ दे दो ना सीदी सादी सी
प्लीज़
प्लीज़
प्लीज़
थंक उ

November 28, 2009

मुहावरे-अश्वनी

बेकार चीज़ फेंक देना होता है सही...
ऐसा सुनते आए अब तक...
पर जब शब्द अर्थ खोने लगें तो क्या करें ...
ज़ाहिर है फेंक दो उन्हें अंधी खाई में...
ऐसे कुछ शब्दों से बने मुहावरे खो चुके हैं अर्थ...
पर कुछ लकीर के फकीर करते हैं उनका उपयोग गाहे-बगाहे...
उदाहरणार्थ वो कहते हैं 
झूठ के पाँव नहीं होते...
पर अक़्सर नज़र आते  हैं कई झूठ, कई तरह की दौड़ों में अव्वल आते हुए..
सांच को आंच नहीं...
पर सच जला-बुझा सा कोने में पड़ा मिलता है अदालतों में...
भगवान के घर देर है...अंधेर नहीं..
पर भगवान ख़ुद अमीरों की इमारतों में उजाला करने में है व्यस्त
सौ सुनार की, एक लोहार की...
पर आज के बाज़ार ने लोहार को गायब कर दिया बाज़ार से...
न नौ मन तेल होगा...न राधा नाचेगी..
पर राधा मीरा नाच रहीं चवन्नी-अठन्नी पर किसी सस्ते बार में...
चैन की नींद सोना...
पर मेरे बूढ़े पिता रिटायर होने के बाद जागते हैं उल्लुओं की तरह... 
अनिष्ट की आशंका में...
ये मुहावरे मिटा डालो 
फाड़ो वो पन्ने जो इनका बोझ ढो के बोझिल हो चुके.. 
निष्कासित करो उन लकीरी फकीरों को..
जो इनके सच होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं...

November 22, 2009

दुविधा-अश्वनी

काफ़ी देर तक कलम लिए हाथ में रहा बैठा
लिख ना पाया अक्षर एक
इतने सारे विचारों में से लिखने लायक विचार ढूँढना होता है मुश्किल
पर कभी होता है आसान बहुत
ज़िद करके कलम उतार दी कागज़ की ज़मीन पर
जब उठाई कलम तो कुछ आड़ी तिरछी रेखाओं के इलावा कुछ न था
लेखक से चित्रकार भला
उसे सुविधा है की वो आड़ी तिरछी रेखाओं से होते हुए पहुँच जाता है वहां
जहाँ लेखक को पहुंचना होता है केवल शब्दों के पुल पर
पता नहीं मेरी यह बात आपको कितनी ठीक लगेगी
पर मेरे दिल में आई और मैंने कह दी
वैसे भी आज लिखना बहुत मुश्किल लग रहा है
हाँ बातें करने का बहुत मन है
किसी के साथ

November 19, 2009

यूँही ही-अश्वनी

इतने लोग ...
इतनी बातें...
इतनी जिंदगानियां॥
इतनी सोचें...
इतने किस्से...
इतनी कहानियाँ॥
जितने लोग
उतनी बातें
उतनी सोचें
उतने ही किस्से
उतनी कहानियाँ
चल ढूंढे आज कहीं थोड़ी जिन्दगानियां भी॥

October 27, 2009

पाना खोना-अश्वनी

पाना नही है कुछ..
पा के पाते रहना है कुछ कुछ...
पा के खो देना है बहुत कुछ..
खो के पा लेना है सब कुछ

October 21, 2009

यात्रा-अश्वनी

बिना मंजिल के कोई सफर हो....
अजनबी सा एक हमसफ़र हो...
राह इतनी दुशवार हो की रस्ता ना सूझे...
कुछ के मिले जवाब,कुछ सवाल रहे अबूझे॥
भटकते रहे ख़लाओं में...
मांगे बादल हवाओं से पर प्यास ना बुझे कभी...
चाँद से मिले रोशनी पर रात न ढले कभी॥

October 14, 2009

दिल-अश्वनी

मना मना के दिल ये हारा
माने ना दिल आवारा
दिल
की बात है
दिल थाम ले
दिल से सुन ले यारा

September 5, 2009

एक विचार-अश्वनी

सोच की सोच बड़ी
उल्टे पलटे जूझे पछाडे और कभी काबू काबू
कदम मिला के साथ कभी और कभी बेकाबू...
घी मिश्री सी घुल जाए मुंह में
कभी कड़वी निम्बोली सी
वाचाल बातूनी रहे बनी कभी
कभी मुंह सिल अनबोली सी...
कभी ये मन का मौसम बदले
बन के एक ठंडी हवा
छाले डाले आत्मा पे कभी
कभी जिस्म को कर दे तपता तवा...
कभी लगे यह मेरी है
कभी मेरी होने में देरी है
कभी मालिक बन बैठे
कभी जीवन भर की चेरी है...
जैसी भी है,जो भी है
बस साथ रहे
ना होगी ये तो मेरी हस्ती क्या
बिन मल्लाह कश्ती क्या
बिन इंसा बस्ती क्या
सोच है तो मस्त रहता हूँ
बिना सोच के मस्ती क्या...

July 18, 2009

खुशबू-अश्वनी

मेरे अहसास साँस साँस साथ
जीवन चक्र का चक्का घूमे
धरती डोले आकाश चले पलकों तले
प्यास बुझे भड़के संग संग
दिल जले धड़के संग संग
रात शाम तड़के संग संग
संग संग इक रहने लगी हर पल संग संग
अंग अंग लग के अर्धांगिनी बनी
संग संग चल के बनी संगिनी
रंग रंग रंग के बनी रंगिनी
भोर की नमी अब रहती है थमी दोपहर तक
दोपहर की आंच रखता हूँ बांच शाम तक
शाम की लाली बन के हरियाली मिलती है रात को
रात का चाँद रहता है मांद भोर तक
रात शाम दोपहर भोर
इन सब के ओर छोर छाते हैं पोर पोर
फूटती है एक आभा नई
मेरे रंग खिल गए कई
सात रंगों में समा जाऊं ऐसा धनुष नही मैं इन्द्र का
मैं हूँ हज़ार रंग
बस रंगिनी संग

June 4, 2009

माधवी-अश्वनी

मेरी धड़कन... धड़क रहा हूँ
मेरी चाहत ... चहक रहा हूँ
मेरी तड़पन ... तड़प रहा हूँ
मेरी आवाज़... सुन रहा हूँ
मेरी कोशिश ... कर रहा हूँ
मेरी नींद ... सो रहा हूँ
मेरी खुमारी ... खो रहा हूँ
मेरी हलचल ... हिल रहा हूँ
मेरी अदा ... निहार रहा हूँ
मेरे चैन ... पा रहा हूँ
मेरे बेचैन ... हो रहा हूँ
मेरे सपने ...देख रहा हूँ
मेरी साँस ..पी रहा हूँ
मेरी ज़िन्दगी...जी रहा हूँ

May 31, 2009

माधवी मेरी मीरा मेरी-अश्वनी

किसी एक तारीख के इंतज़ार में रोज़ रोज़ तारीखें देखना भी एक अजीब सा सुख देता है॥
हर गुज़रती तारीख के साथ मेरा इंतज़ार कम होने की बजाए बढ़ रहा है।
इतनी आकुल व्याकुल अव्यवस्थित चंचल बेचैन दशा मन की कभी ना थी
बहुत इंतज़ार के बाद यह इंतज़ार के दिन आए
साल भर के सारे मौसम देख लेता हूँ कुछ पल में अगर चाहूँ तो आजकल
कोई एक इंसान कैसे आपके रात दिन सुबह शाम गर्मी सर्दी प्रभावित करने लगता है
यह देखना महसूस करना कोतुहल का विषय है मेरे लिए
मैं ज्यादातर आश्चर्यचकित ही रहता हूँ आजकल
मेरे जीवन में इन्दरधनुष लाने वाली ,मेरी सोच को हर्षाने वाली वो
माधवी
मेरी पत्नी बनेगी २६ जून को
और मैं उसका पति
वाह ज़िन्दगी ........

May 21, 2009

पिघला है कुछ भीतर-अश्वनी

भूरे शीशे से छन कर आती दोपहर शाम सी लगती है
और घर के अन्दर की शाम उसी शीशे से बाहर जा के दोपहर हो जाती है
अब शीशे मौसम को बदल रहे हैं
मेरे दिल का मौसम किसी के ख्याल आने पे या न आने पे बदल जाता है
मेरे दिल का शीशा पिघला दिया किसी ने
मैं जल्द ही अपने घर का शीशा भी तोड़ दूँगा
या कोई आ कर पिघला देगी उस शीशे को भी अपनी एक छुअन से
ऐसा नही की उसके छूने से सिर्फ़ शीशा पिघलता है
मेरा अंहकार भी गल जाता है उसके छूते ही

May 19, 2009

उसका नाम-अश्वनी

मेरे भीतर एक समंदर है जो लहर लहर स्पंदित होता है तेरी हर छुअन से ,
तेरी छुअन के निशान दिखाई देते हैं दिल की हर परत पे
दिल के भीतर की सबसे भीतरी परत में एक मोती है
मेरा दिल एक सीप है
धीरे से सीप खोल वो मोती मैंने मुँह में रख लिया
कुछ पल को लगा चाँदनी घुल गई मेरे मुख में

यह अहसास जो चल के आया है तेरे पास से मेरी ओर
अनोखा है
हर शब्द में तेरा अक्स छुपा है मेरे
शब्द एक नवेली दुल्हन से किलकिल करते हैं घूंघट के तले
गर्म साँसों से मेरी घूंघट तेरा हिल रहा है थोड़ा थोड़ा
कुछ शब्द चहक चहक फिसले इधर उधर घूंघट से
मैंने एक एक शब्द उठा के अपनी आँखों से रखा अपने होंठो पे
मेरे होंठों पे एक नाम उतर आया
माधवी......