January 17, 2012

चल कहीं दूर निकल जाएँ-अश्वनी

प्यार पर इतना लिखा-कहा-सुना जा चुका है...
अब मैं और क्या लिखूं ?
रिश्तों पर इतना देखा-सुना-पढ़ा है..
अब मैं और क्या कहूं?
भावनायों-जज्बातों की बातों का तो कहना ही क्या..
स्वेटर की तरह,एक सिरा पकड़ो तो पूरे के पूरे उधड़े नज़र आये हैं हमेशा..
मैं कौन से नए जज्बातों की करूं बात??
राजनीति,देश,गरीबी,शोषण,भ्रष्टाचार पे लिखने वाले हैं हज़ार..
मैं क्यूँ उनकी भेड़-भीड़ में हो जाऊं शामिल??
धर्म-कर्म,माया-मोह,लोभ-लालच,क्षोभ-कुंठा,पिपासा-वासना पे कह-कह के लोग थक ही नहीं रहे हैं..
और मैं इन पर लिखने के विचार से ही थक जाता हूँ..
जीवन-मरण,भगवान-शैतान,अच्छा-बुरा,खरा-खोटा,सच्चा -झूठा..
इसपे तो कोई भी कह लेता है आजकल..
मैं इसपे लिख के अतिसाधारण लोगों में क्यूँ लिखवाऊं अपना नाम?
यादें-वादे-इरादे,महबूब की बातें भी हो चुकी हैं खूब..
बड़े बड़े शायर कह गए हैं जो कहा जाना चाहिए था..
और जो कहने लायक था..
मैं अब निम्नस्तरीय लिख के उनके लिखे हुए को क्यूँ करूं शर्मिंदा?
इस धरती पर जो कुछ भी लिखे,कहे,सोचे जाने लायक था..वो हो चुका..
नए विषयो..नए विचारों,नए मुद्दों की तलाश में खोजने पड़ेंगे कुछ नए ग्रह..
या जाना पड़ेगा दूसरी दुनिया में..
जिसे स्वर्ग-नरक..जन्नत-जहन्नुम के नाम से मशहूर कर दिया है कुछ चतुर लोगों ने..
अब तो चिता पे लेट के कुछ नया सोचूंगा या फिर कब्र में उतर कर..

11 comments:

  1. Badhia.... Achchha Thought hai...

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  2. excellent....

    बहुत अच्छी कविता...वाकई सब से जुदा ..
    keep writing...live long :-)

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  3. शुक्रिया अजय..धन्यवाद विद्या..प्रशंसा..कविता का उत्प्रेरक है..यूँही तारीफ़ मिलती रही तो ना तो कविता लिखना छोडूंगा और ना ही इस दुनिया को छोडूंगा..

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  4. कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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  5. कितना भी लिखा जाए , कहा जाए , पढ़ा जाए , सुना जाए - वह अधूरा ही रह जाता है . प्यार जज़्बात, घर, यादें और और की तलाश में होती हैं - इसलिए जीना है

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  6. सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद

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  7. निश्चित ही सब कहा जा चूका है... कुछ भी नया नहीं कह सकते हम पर मौलिकता का श्रृंगार कहे गए विषयों पर भी आपसे कुछ विशिष्ट लिखवा ही देगा...
    मौलिकता का दामन पकड़ कर चल रहे हैं चलते रहिये...
    ढेर सारी शुभकामनाएं!

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