November 24, 2012

रोशनी के साथ जादू की झप्पी-अश्वनी


सूरजमुखी का फूल याद आते ही आंखों के सामने आ जाता है एक हंसता-खिलखिलाता चेहरा... आपने कभी ध्यान से सूरजमुखी को देखा है? ऐसा लगता है जैसे एक बड़ा-सा चेहरा चौड़ी मुस्कान लिए लहलहा रहा हो। कितना ख़ूबसूरत और असंख्य गुणों से भरपूर है सूरजमुखी! गंधरहित होकर भी अपने गुणों की सुगंध हर ओर फैलाता है। एक ऐसा फूल जो सूरज की पहली किरण को अपने भीतर संजो लेने के लिए उसकी ओर टकटकी लगाए बैठा रहता है, और फिर दिन भर जिधर सूरज घूमे उधर घूमता रहता है। सूरज छिप जाने के बाद अपनी पंखुड़ियों को समेटकर किसी साधु की तरह समाधि में चला जाता है।
सूर्य की किरणें इस प्राणी-जगत में एक नई ऊर्जा, एक नई रोशनी, एक नई सुबह का आग़ाज़ करती हैं, और सूरजमुखी इस बात की गवाही देता नज़र आता है कि प्रकृति तो भरपूर दे रही है, लेकिन ज़रूरत है बस उसकी तरफ नज़र घुमाने की। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो जीवन की एक बड़ी सीख देता लगता है सूरजमुखी। अक़्सर सुख और शांति हमारे इर्द-गिर्द ही होते हैं, लेकिन हम जीवन भर उसकी तरफ पीठ किए पड़े रहते हैं। जाने-अनजाने रोशनी को छोड़ अंधेरों की तरफ रुझान हो जाता है। ऐसे में सूरजमुखी को याद करें तो अंधरे से उजाले की ओर जाने का मन करेगा।
जब छोटा था तो छोटे शहर में रहता था। छोटे-से घर के बाहर बड़ी-सी कच्ची जगह होती थी। अभी बड़ा होकर बड़े शहर में हूं। छोटे-से घर के बाहर वाली कच्ची जगह का नामो-निशान नहीं है यहां। पर अभी भी बचपन के घर का वो बगीचा याद आता है जिसमें पिता जी ने एक दिन कहीं से सूरजमुखी के बीज लाकर बो दिए थे। कुछ दिन में वो बीज नन्हे पौधे बन गए और फिर वो पौधे बड़े होते गए। एक दिन उनका कद मुझसे भी बड़ा हो गया। मैंने उनका बढ़ना देखा था। वो मुझसे ऊंचे हो गए थे, पर वो मेरे दोस्त थे। अपने फूल मेरी तरफ झुकाते तो लगता कि मुझसे हैलो कर रहे हों। मैं दिन में कई-कई बार उनको देखने आता। हर बार यह पक्का करता कि उन्होंने सूरज की तरफ अपना मुंह मोड़ा हुआ है या नहीं... और उन्होंने मुझे कभी निराश नहीं किया। वो हर बार अपने नाम और ख्याति को सार्थक करते दिखते। जब वो थोड़े और बड़े हुए, पूरी तरह परिपक्व हो गए तो पिता जी ने उनके कुछ बीज निकालकर मुझे दिए। मैंने उन्हें छीला और मुंह में रख लिया। मुंह में जैसे रोशनी-सी घुल गई। वो स्वाद आज भी भुलाए नहीं भूलता। लेकिन आज मेरे पास चाहकर भी मेरे वो दोस्त नहीं हैं जिनसे मैं वो खाने के बीज मांग सकूं। आज सूरजमुखी के बारे में लिखते हुए मैं सोच रहा हूं कि मेरे घर में जो सूरजमुखी का तेल इस्तेमाल होता है, उसका कारण सूरजमुखी के गुण हैं या उनसे मेरी बचपन की दोस्ती... या शायद दोनों ही!
सूरजमुखी के खेत में जाएं तो लगता है कि कई नन्हे-नन्हे सूरज धरती पर खिल आए हैं। किसी उदास मन को कुछ देर सूरजमुखी के सान्निध्य में छोड़ दीजिए तो वही उदास मन हिलोरे लेने लगता है। इसके बीज ऐसे लगते हैं मानो इसकी आंखें हैं जो बड़ी मासूमियत से सुबह खुलती हैं... और इसका फूल ऐसे लगता है जैसे सूरज से कह रहा हो कि हे सूरज! ऐसे ही चमकते रहना। ऐसे ही अपनी प्राणवान शक्ति को जन-जन तक पहुंचाते रहना। मैं तुमसे यह वादा करता हूं कि हर कदम तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम्हारी रोशनी का अनुगमन करूंगा। तुम्हारे नाम से नाम पाया मैं सूरजमुखी हरसंभव कोशिश करूंगा कि मैं भी तुम्हारी तरह निराश, उदास दिलों में नवजीवन का एक छोटा-सा सूरज बनकर चमकता रहूं।’ 

(दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका 'अहा ज़िंदगी' के सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित) 

September 13, 2012

कमबख्त - अश्वनी

कविता लिखने कलम उठाई
मुद्दों विचारों सोचों
का मचा झंझावात
कलम रखी
सो गया

कमबख्त
नींद भी नहीं आई

August 20, 2012

तूने - अश्वनी

चन्द लम्हे  
कंपन से गुज़रा
हाथ
लकीरें गडमड हो गई
एक छोटी सी कंपन ने
तकदीर बदल डाली

गुनाह के रस्ते पे था 
अकेला 
भटकन थी डगर 
तूने पास बिठाया  
दो पल
तस्वीर बदल डाली 

कुछ घटनाओं को 
समझने लगा था 
प्यार 
एक बादल को बहार
तूने चंद की बातें
बादल छंट गया
तदबीर बदल डाली 

नाशुक्रा था 
सदा से
तेरा करम हुआ
सजदे में आ गया 
गिर गया ग़ुरूर
तहरीर बदल डाली 

August 16, 2012

घुमंतू - अश्वनी

घुमंतू आत्मा
कैद
शिथिल जिस्म में

घुमंतू सोच

कैद

कुंद दिमाग में

घुमंतू प्रेम

कैद
बासी सम्बन्ध में

घुमंतू नज़र

कैद
जबरन नकाब में

घुमंतू चाह

कैद
ओढ़ी आह में

घुमंतू घुमंतू

घुमंतू घुमंतू
रहूँ घुमंतू
सोचूं घुमंतू
चाहूँ घुमंतू
भोगूँ घुमंतू
पाऊं घुमंतू
देखूं घुमंतू
जियूं घुमंतू

घुमंतू घुमंतू

घुमंतू घुमंतू
भटकूँ घुमंतू
नष्ट घुमंतू
कष्ट घुमंतू
पस्त घुमंतू
शांत घुमंतू
मरूं घुमंतू
विलीन घुमंतू

अनदेखा घुमंतू

अनोखा घुमंतू

August 14, 2012

अक्षम आँख - अश्वनी

हलचल हुई
हिया हिला
ताके टुकुर टुकुर
अपना अक्स
झिलमिल झिलमिल
धुंधला धुंधला

हाथ बढ़ा पोछा आइना

आइना चमका
अक्स
धुंधला मगर

घाव अंदरूनी

इलाज बाहरी
नज़र पे जाला
नज़र नाकारा
दृष्टि प्राप्त करनी होगी
जो मार करे दूर तक
जो वार करे दूर तक

जब दिखेंगे भीतर के ज़ख़्म 

रखूंगा मरहम सा हाथ
हर लूँगा हर पीड़ा


पहले अपनी
फिर तेरी

July 24, 2012

काहे ? - अश्वनी















टिक टिक
टप टप
धप धप  
समय सरका
पानी बरसा
कदम धमका  
 
ठक ठक 
चिप चिप 
दिप दिप 
द्वार खटका 
बदन तमका
मुख चमका 

लप लप 
गट गट
छन छन  
स्वाद बहका 
गला चहका 
घूंघरू लहका 
 
सब है चलायमान 
सब है निरंतर 
सब है जारी 
सब है सदा
 
फिर क्यूँ दिल करे 
हूम हूम
क्यूँ न करे 
धक धक

July 17, 2012

ऐ - अश्वनी


सिलसिलो
टूटो

किस्मत
 
चमक
 
आह

कर असर

मेहनत

हो सफल

प्यार



ख़ुशी

ठहर

सोच

अच्छा सोच

समय

कट

संताप

घट

ऐ ज़िन्दगी

गले लगा ले

July 6, 2012

ऐसे कैसे चलेगा??? - अश्वनी

सीप सा जीवन
मोती चोरी लेकिन

हथेली बरक़रार

लकीरें गायब लेकिन

दिल प्रस्तुत

धड़कन शांत लेकिन

आंखें खुली
दृष्टि धुंधली
मगर

कदम कायम
राह अदृश्य किन्तु

सांस
सुरक्षित
साहस समाप्त परन्तु

जीवन जारी
जान जमींदोज पर

ऐसे कैसे चलेगा यार ???

July 2, 2012

मेरी इक नन्ही कहानी -अश्वनी

क़िस्से क़िस्म क़िस्म के
क़िस्म क़िस्म के लोग
लंबे लंबे क़िस्सों में
मेरी इक नन्ही कहानी
सांस लेने को निकालती मुंह
चादर से


तभी कोई बड़े गाव तकिये सा

किसी बड़े आदमी का 
बड़ा सा भारी क़िस्सा 
धप्प आके गिरता है
मेरी नन्ही कहानी के मुंह पर

मेरी कहानी एक चुटकुला बनके रह जाती है 

तब ना - अश्वनी

अगर मगर से पार होते
तब ना बोलते ओ.के
 
अंतु परन्तु किंतु से बचते
तब ना साथ आते

कैसे होगा,क्या होगा से हटते
तब ना कदम मिलाते 

झिझक को झटकते 
तब ना नज़र मिलाते

दूर की सोचते 
तब ना पास की समझते

थोड़ा कम सोचते 
तब ना थोड़ा सोच पाते

मौक़ा तो देते 
तब ना मौक़ा पाते 

क़ुदरत को महसूसते 
तब ना नदी बन बहते 

जीना जानते 
तब ना जीने देते 

मुझको समझते 
तब ना मुझको समझते 
मुझको जानते 
तब ना मुझको जानते

मुझको.....
तब ना.....

May 28, 2012

किस्मत हो सकता है इसका शीर्षक - अश्वनी

बहना नाँव की किस्मत है
डूबना भी
नदी की किस्मत है सागर
बाँध भी
चमकना चाँद की किस्मत है
ग्रहण भी
मिट्टी की किस्मत है जिस्म
खिलौना भी
धड़कना दिल की किस्मत है
टूटना भी
इज़हार की किस्मत है हाँ
ना भी
उड़ना पतंग की किस्मत है
कटना भी
किस्मत की किस्मत है खुल जाना
बंधना भी

मेरी किस्मत है तू

नहीं भी

May 8, 2012

ख़्वाबों में ख़्यालों में - अश्वनी

मेरी नींद में इक ख़्वाब है 
मेरी नींद इक ख़्वाब है 
ख़्वाब में अक्सर कह देता हूँ दिल की 
ख़्वाब में अक्सर समझता हूँ उसके दिल की

ख़्वाब की ज़ुबान जुदा है 
ख़्वाब में बहुत ज़्यादा बोलना सुनना नहीं पड़ता 
ख़्वाब बहुत समझदार होते हैं
इशारों को समझ जाते हैं
आँखों की हरकत
होंठों की जुंबिश
धड़कन की आवाज़
रूह की लरज़
दिल की तर्ज़
सब समझ जाते हैं

हकीकत में जो इश्क ख़्वाब लगे
ख़्वाब में वो हकीकत लगता है
ख़्वाब में सरहद वीज़ा नहीं होता
पूरी दुनिया पलों में घूम आता हूँ
ख्वाब में मैं हर जुबां बोल लेता हूँ 
ख़्वाब में मैं कहीं भी खुद को अजनबी नहीं पाता

इतना सही है ख़्वाब में जीना
तो
क्यूँ जीना पड़ता है हकीकत में
मैं ख़्वाब में जीने का ख़्वाब देखता हूँ
मैं अक्सर ख़्वाब में इक ख़्वाब देखता हूँ
मेरी नींद में इक ख़्वाब है 
मेरी नींद इक ख़्वाब है
ख़्वाब में अक्सर कह देता हूँ दिल की 
ख़्वाब में अक्सर समझता हूँ उसके दिल की

May 2, 2012

बिना यादों के - अश्वनी

यादों ने जब सताया 
यंत्रणा की हद तक
मैंने मांगी मन्नत
ख़तम हो यादें
पाताल में जाए यादों का सिलसिला
मन्नत हुई पूरी
एक सुबह जब जागा तो 
खुद को यादों से तन्हा पाया
दोपहर तक खुश रहा
शाम होते बेचैनी शुरू हुई
रात में बेचैनी तकलीफ बन गई
करवट में गई रात
सुबह मनहूस लगी
याद थी तो परेशान करती थी
नहीं है तो बर्बाद कर रही थी 
फिर उठे हाथ मन्नत को
याद रहने दे बाकी 
चाहे तो मिटा दे मुझको
पाताल में डाल मेरी हस्ती
पर मेरी यादें रखना जिंदा

यादों के बिना 
मिटा ही तो पड़ा था  
हस्ती भी कहाँ थी मेरी 
बिना यादों के

April 30, 2012

दिल -अश्वनी

रात दिन दस्तक दिल के दरवाज़े 
बंद कपाट खुले
दिल का आमंतरण दिल को दिल से
दिल मेज़बान दिल मेहमान 
दिल से परोसा दिल 
दिल से लगाया दिल 
दिल में शामिल दिल
दिल में समाया दिल 
रात दिन दिल ही दिल
बात मुलाकात दिल ही दिल 
दिल खिला रहे
दिल मिला रहे

दिल को समझे दिल
दिल की सुने दिल 
दिल,दिल से ना हो खाली
दिल में दिल बना रहे   

April 29, 2012

निर्णय - अश्वनी

मैं उसके आने की राह देखूं 
या
खुद ही पहुँच जाऊं उस तक

छुरा खरबूज़े पे गिरे
या
खरबूज़ा छुरे पर
क्या फ़र्क पड़ता है?

ये खरबूज़े वाली उदाहरण से 
अच्छी कोई उदाहरण हो तो बातिएगा
मुझे अभी यही सूझी
सो चिपका दी!!  

April 28, 2012

अच्छा दिन - अश्वनी

अच्छा दिन था
24 घंटे में ही पूरा हो गया
कुछ ढीठ दिन 
बरसों ख़तम नहीं होते

April 24, 2012

आप क्या कहते हैं? - अश्वनी

जागने सोने कि हद जब मिटने लगे 
तो 
सोया सोया जागूं 
और 
जागा जागा सोऊँ

मुझे अच्छा लगता है
होने और ना होने के बीचे होना 
मुझे अच्छा नहीं लगता है
होने और ना होने के बीचे होना

मुझे नफरत है 
होने और ना होने के बीच होने से
मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता 
होने और ना होने के बीचे होने से

एक ही स्थिति एक इंसान को 
कई तरह से प्रभावित करती है
जब तक जीवन है  
ये चरण लगे ही रहते हैं 
आप क्या कहते हैं ? 

April 23, 2012

मैं और तू - अश्वनी

बहुत दिन हुए खुद से बात हुए
बहुत दिन हुए तुमसे बात हुए
फुर्सत तुम्हे नहीं
फुर्सत हमें कहाँ
तेरा अपना जहां
मेरा अपना जहां 
तेरा रस्ता कहाँ 
मेरा रस्ता कहाँ

मिलना हो तो आना वहाँ
पहली बार मिले थे जहाँ 

बारिश - अश्वनी

बारिश में क्या है ऐसा
कि रही है तो
गुदगुदाती रहती है
ना आए तो इंतज़ार
और के हटी हो तो
खुशबू ,यादें और
किसी की याद
किसी और मौसम में ये बात कहाँ 

बारिश होती है जहाँ 
मैं खिलता हूँ वहाँ 
बारिश होती है जहाँ
मैं मिलता हूँ वहाँ

बारिश!!!
अच्छा नाम है ना?
यूनीक सा?

April 21, 2012

सपना रे - अश्वनी

मैं हर दिन कविता कह सकता हूँ
क्योंकि मैं हर रोज़ कोई न कोई सपना देखता हूँ
सपने को शब्द दे दो तो कविता हो सकती है
ऐसा मैंने पाया है


जैसे मेरा कल का सपना

इक नन्हा खेल रहा था गोद में
हुबहू मेरा अक्स
नन्हे हाथों से छूता मेरा चेहरा
जैसे छू रहा हो आइना
हैरान था अपना सा कोई देख कर
इक अपना सा बड़े चेहरे वाला

पर उस से ज़्यादा हैरान मैं था

कैसे सपने में दिखा गया वो मुझे
जो दिखा नहीं जीवन में
कैसे महसूस किया वो स्पर्श
कैसे आत्मसात हुई वो गंध
कैसे हुई वो अनुभूति

सपना देखते हुए सपना,सपना नहीं लगता

इसीलिए सपना लगता है मुझे कविता सा

जब घटित हो रही होती है तब

कविता भी कविता सी कहाँ लगती है

रूठा रूठी - अश्वनी

उसे सही से रूठना नहीं आता
पर मुझे आता है मनाना सही से
वो अक्सर रूठती है
बिना किसी विशेष कारण के
या फिर मेरे मनाने के लिए

मैं बहुत दिन से नहीं रूठा
मनाने में ही लगा रहता हूँ
मैं रूठना भूल गया हूँ

या शायद
वो कोई वजह ही नहीं देती मुझे रूठने की

प्रेमिका सी कविता - अश्वनी

प्रेमिका सी कविता
कई दिन के बाद मिलो तो
बात नहीं करती आसानी से
अनमनी सी रहती है
रूठी

धीरे धीरे खुलती है

पंखुड़ी सी
उलाहना सा देती है
मिलना नहीं था अक्सर
तो
क्यूँ जान पहचान बढ़ाई
फिर कहती है कि
आ ही गए हो तो बातें कर लो दो चार
फिर शरारती हंसी हंसती है
छूने लगती है बहाने बहाने
कहती है
मैं तो मज़ाक कर रही थी
मिलते हो तो अच्छा ही लगता है
चाहे सालों बाद मिलो
पर मिलना ऐसे ही
जैसे मिल रहे हो पहली बार
अजनबी मगर मेरे अजनबी
और हाँ
मुस्कुराना मत छोड़ना
तुम्हें मुस्कुराता देख तो पास आती हूँ तुम्हारे
अजनबी मगर मेरे अजनबी!!!

April 8, 2012

सोच का चक्का जाम - अश्वनी

झिलमिल तस्वीर दिखे जब साफ़ आँखों से
तब ख़लल दिमाग का है दोषी
दिमाग में घूमता इक सर्प
कुंडली मारे लपेटता है मगज़
स्पष्ट को करता धुंधला
धुंधले को करता और धुंधला


फिल्टर से छाना पानी

आत्मा कैसे छानूं?
साबुन से धोए हाथ
लहू कैसे धोऊँ?
डस्टर से झाड़ा बिस्तर
गिल्ट कैसे झाडूं?

ढक लिया तन
कैसे ढकूँ मन?
बुझा दी बत्ती
डर कैसे बुझाऊं?
पानी से साफ़ किया चेहरा
अक्स कैसे साफ़ करूँ?
सुला दिया जिस्म
विचार कैसे सुलाऊं?

बंद की आँख 
खिड़की कैसे बंद करूँ?
तोड़ दिया गिलास 
बोतल कैसे तोडूँ?
काट दी जीभ
आवाज़ कैसे काटूँ?
खाली किया जाम
सागर कैसे पीऊँ?
बीवी को मना लिया 
बच्चे को कैसे मनाऊँ?
बच्चे को मना लिया
बीवी को कैसे मनाऊँ?

जला दी किताब
कविता कैसे जलाऊं?

March 24, 2012

बहरूपिया -अश्वनी

मेरा मेरा मेरा 
इतना मेरा है ज़िन्दगी में 
कुछ और सुझाई नहीं देता
कुछ और दिखाई नहीं देता

कभी देखे जो तेरा इसका उसका 
उस दृष्टि पर उतर आया है मोतिया 
उस दिल में हो गई है ब्लोकेज 
धमनियों में जम गया है कचरा
जिस्म हुआ नाकारा
आत्मा पे छा गई है मौत

मैं तो चाहता था सबका भला
फिर कैसे हुआ इतना स्वार्थी
कहाँ से आया इतना मेरा मेरा मेरा

या तो दुबारा से शुरू हो सब
या मैं स्वीकार कर लूं वस्तुस्थिति
या मैं खोज पाऊं स्वार्थ का उदगम
या मैं बन जाऊं लठ यानि पीस ऑफ़ वुड

जो भीगता हो बारिश में
सूखता हो धूप में
टूटता हो कुल्हाड़ी से
जलता हो आग में
तड़क तड़क 
पर
चुपचाप
स्पन्दनहीन

या खुदा...
या तो चैन दे
नहीं तो उतर आ ज़मीं पर
और भोग मुझ सा जीवन
कहलाना बंद कर खुदा 
और जूझ 'मेरे' सवालों से
 
आह्ह्ह....तू नहीं है खुदा
जा माफ़ किया तुझे बहरूपिए

March 22, 2012

सिली ओल्ड मी - अश्वनी

फिर वही विचार
वही सोच
वही उधेड़बुन
अपनी पूंछ को मुंह में दबाने को
गोल गोल घूमता जैसे कुत्ता

पता नहीं क्यों 
जंगल बहुत आता है तस्वीर बन
ज़हन में
पर शांत नहीं अब जंगल
जल रहा है धूँ धूँ 
सुलग रहा है सूँ सूँ 
सुबक रहा है ऊँ ऊँ
बारिश चाहिए इसे 
जलन मिटे चुभन घटे रुदन हटे
या फिर ख़ाक हो जाए 
जड़ तक
नामोनिशान मिट जाए

कुछ बरस बाद जब खड़ी हो यहाँ इक टाउनशिप
तो उसके किसी फ्लैट के किसी कमरे में 
बूढ़े दादा दादी नाना नानी 
सुनाए इक जंगल की कहानी
वो जंगल जो जलता था उनके दिल में कभी
वो जंगल जो पलता था उनके दिल में कभी

कहानी सुनके हंसें बच्चे
हा हा हा हा हा 
आपस में करने लगें बातें 
कि
पगला गए हैं दादा दादी
और 
सठिया गए हैं नाना नानी
एकदम बच्चा समझते हैं हमें
कहीं होता है ऐसा जंगल?
जहां पेड़ ही पेड़ हों और बहुत से जानवर
सिली ओल्ड पीपल!!!
हा हा हा हा हा 

जंगल अब भी जल रहा है
सुलग रहा है
सुबक रहा है

नोट- आजकल ये बहुत हो रहा है मेरे साथ..कहीं के लिए निकलता हूँ..कहीं पहुँच जाता हूँ...मैं तो जंगल में सैर को निकला था..पर मैंने ये जंगल कब जला डाला..पता ही नहीं चला..सिली ओल्ड मी!!!

March 18, 2012

वैष्णव जनतो तेने कहिए जे -अश्वनी

कसमसाहट नहीं हटती
बैचनी नहीं घटती
बेसूकूनी नहीं जाती
कोई ऐसा है?
जो
शांत रहा हो..चैन से जिया हो..सुकून से गया हो
अगर ऐसा है कोई
तो
वही है भगवान..खुदा..परमात्मा..ईश्वर
मेरे लिए 

जो सूली पे लटका
आरी से काटा गया
कढाहे में उबाला गया
तमाम दुःख ज़ुल्म सहे
वो कैसा भगवान
भगवान सी शक्ति होती
तो चुन ना लेता अपने लिए तमाम सुविधायें
सुकून चैन और शान्ति

भगवान है या नहीं है
ये दुनिया भर में बहस का सबसे लोकप्रिय मुद्दा है
मैं कभी भी इस बहस में नहीं पड़ता
मैं हमेशा ये मान के चलता हूँ कि भगवान है
अक्षम सा सहमा सा
दबा कुचला उपेक्षित शोषित पीड़ित गरीब
जो आजकल कुछ ज़्यादा ही दिखाई पड़ने लगा है
वही है भगवान
स्वर्ग में प्रवेश निषेध है जिसका
जन्नत से धकिआया जिसको 
हर अच्छी सुंदर रमणीय जगह से निष्काषित
इंसान का रूप धर धरती पे पिसने को मजबूर 
सर्वहारा(सब कुछ हार गया हो जो)वर्ग का मनुष्य ही भगवान है दरअसल

अब देखो ना
कितना विवश और अक्षम है भगवान
कि जितना भी कोसो गलियाओ 
कुछ रीऐक्ट ही नहीं करता 
सही में चमत्कारी शक्तिशाली मायावी होता 
तो मुझे श्राप न दे देता?
मुझे बना देता 
तोता मेंढक या कबूतर 

नोट- मैं अपनी इस बात को बहुत देर तक और बहुत दूर तक ले जा सकता हूँ....पर मुझे पता है कि इस सफ़र में मेरे साथ कोई नहीं जाएगा..क्योंकि मेरे साथ वालों को हाज़िरी लगाने जाना है मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारे में...

ऐसे ही एक ख्याल - अश्वनी

रात हुई
नींद कहाँ?
सुबह आएगी
जाग कहाँ?
दिन होगा
काम कहाँ?
दोपहर होगी
आराम कहाँ?
शाम होगी
शाम कहाँ?
रात होगी
नींद कहाँ?
सपने भी कहाँ?
रात भी रात सी कहाँ?
मैं भी मुझ सा कहाँ?
तुम भी तुम सी कहाँ?
समय नहीं..कुछ और ही संचालित कर रहा है
तुझे भी
मुझे भी

March 14, 2012

दिल से रे - अश्वनी

अन्तरिक्ष अनोखा
दिल झरोखा
दिल ग्रह
दिल उपग्रह
दिल उल्का
दिल का तारामंडल
अन्तरिक्ष यात्री
दो दिलवाले
अन्तरिक्ष यान में बैठ
दिल की करें सैर

दिल से करें सैर 

घना समंदर

दिल के अन्दर
दिल घोंघा
दिल मछली
दिल मूंगा
दिल कछुआ
दिल सीप
अन्दर बैठे
दो मोती
दिल की करें बातें
दिल से करें बातें

बीहड़ जंगल

दिल मंगल मंगल
दिल बरगद
दिल पंछी
दिल झाड़ी
दिल शेर
दिल धरती 
दो बीज
उगने को आतुर
खिलने को आतुर
एक कली एक फूल

दिल के भोले  
दिल से भोले

गाता गगन

दिल मगन मगन
दिल हवा हवाई
दिल बादल आवारा
दिल घटा
दिल मौसम
दिल बारिश
भीगे दो दिलवाले
अंतस तक सराबोर

दिल का नाचा मोर
दिल से नाचा मोर

मंथन मन का

हासिल खला
रौंदा जिस्म
हासिल खला
खंगाली आत्मा
हासिल खला
लहू निचोड़ा
हासिल खला
अंत भला तो सब भला
अंत खला तो सब खला

March 13, 2012

तेरा साथ है तो - अश्वनी

तुम और मैं
जैसे
मैं और तुम
तुम मैं सी
मैं तुम सा

तुम मुझे समझ नहीं आती

मुझे तुम समझ नहीं पाती
समझ से हट के देखा
मैंने तुम्हें
तुमने मुझे
दोनों समझ गए
कुछ नहीं रखा समझ में

मैंने तेरे लिए लहू बहाना था

तुम मेरे माथे पे पसीना भी नहीं आने देती

तुम इंद्रधनुष रखती हो अपने साथ

बेरंग होता हूँ जब
कुछ रंग तोड़
करती हो रंगीन
मुझे

दो समानांतर रेखाएं इन्फिनिटी पे मिलती प्रतीत होती हैं

हम कुछ कदम बाद एक रेखा हो गए
रेखागणित का गणित
फ़ेल हुआ 

मुझे क़िस्मत पे नहीं था यकीन

क़िस्मत से मिली तुम
क़िस्मत चमक गई
मुझे क़िस्मत पे यकीन नहीं होता

वादा था मुलाक़ात का

थोड़ी सी बात का
बात अभी भी जारी है
मुलाक़ात अभी भी है
दो बातूनी मिल जाएँ
तो बात दूर तलक जाती है

प्रेम प्यार इश्क मोहब्बत

से बड़ा है
तेरा साथ 

March 6, 2012

कहीं - अश्वनी

इतनी बातें घुमड़ती हैं मन में
मन नहीं रहता तन में
देह छोड़
पकड़ इक अनजान डगर
वो फिरता है मारा मारा


कहीं वो चाहता है दिल देना
कहीं वो चाहता है जान लेना
कहीं उसको चुप्पी भाए
कहीं बिन बोले रहा न जाए
कहीं वो जला दे दुनिया
कहीं बजाता फिरे हरमुनिया
कहीं टकरा जाए चट्टान से
कहीं डर जाए आसमान से
कहीं संसद पे फेंके पत्थर
कहीं पत्थर से खाए ठोकर
कहीं बतिआये इंसान सा
कहीं लगे शमशान सा
कहीं बात करे दिल से
कहीं बात करे मुश्किल से
कहीं सपना देखे जन्नत का
कहीं गाली दे जन्नत को
कहीं प्यार को माने सबकुछ
कहीं प्यार लगे बेकार
कहीं दोस्त बनाता फिरे
कहीं दोस्त हटाता फिरे
कहीं पैसे को पाना चाहे
कहीं ज़िन्दगी को पाना चाहे
कहीं लिखना चाहे कविता
कहीं मिटाना चाहे कविता
कहीं सब कुछ भुलाना चाहे
कहीं भुला न पाए कुछ भी
कहीं जीना चाहे अनन्त
कहीं मिटना चाहे पर्यंत
कहीं चाहे प्रशंसा
कहीं मांगे भर्त्सना
कहीं प्यार करे जी भर
कहीं नफरत सा रहे अमर
कहीं योगी
कहीं भोगी
कहीं सतर्क
कहीं लापरवाह
कहीं सब जान
कहीं अनजान
कहीं उदार
कहीं संकुचित

मन की इतनी उड़ाने हैं

मैं तो बस डोर थामे हूँ
कभी देता हूँ ढ़ील
कभी कस लेता हूँ मुट्ठी
पर मन अपने मन का राजा है
थमी डोर काट देता है
बंधी मुट्ठी देता है खोल

अभी मुझे समझ नहीं आ रहा कि और क्या कहूं 

इतना पढ़के भी आपको समझ नहीं आ रहा 

तो
या तो ये मेरा कसूर है 

या
मैंने ग़लत लोगों के सामने पेश कर दिया अपना
'मन'

March 3, 2012

दैट्स वट आई लाइक द मोस्ट अबाउट यू - अश्वनी

तेरी हाँ से पहले मुझे लगने लगा था
मुझमें कुछ कमी है
मैं नहीं हूँ प्यार के काबिल
प्यार छूता था मुझे
पर गले नहीं लगता था

प्यार से आत्मविश्वास आता है
आत्मविश्वास से प्यार आता है
प्यार ना मिला तो आत्मविश्वास खोने लगा
आत्मविश्वास खोने लगा तो
प्यार की उम्मीद खोने लगी
इसी खोने पाने में तू आई
मेरी परिभाषाएं बदल डाली तूने
मेरी भाषाएँ बदल डाली तूने

तूने मुझे
पहले गले लगाया
बाद में छूआ
किसी दक्ष मनोवैज्ञानिक की तरह तूने मुझे समेट लिया
जब सबने मुझे समझ लिया था मुर्दा
तूने सांस में सांस भर दी
मेरी ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कर दी

अब अगर मैं कवि बनता हूँ
तुझपे कविता ग़ज़ल कहता हूँ
तुझे कविता ग़ज़ल कहता हूँ
तो कहता हूँ
किसी को अच्छा लगे तो लगे
ना लगे तो मेरी दास्ताँ सुन ले
उसके बाद भी अच्छा ना लगे
तो
मुझे क्या
और
तुझे भी क्या
 

तूने मुझे ऐरोगैंस सिखाई है
एंड
दैट्स वट आई लाइक द मोस्ट अबाउट यू

March 2, 2012

वादा- अश्वनी

तुम
तुम हो
जैसे तुम हँसती हो
वैसे हँसने को तुम्हारा सा दिल चाहिए
मासूम और सुंदर


तुम

तुम हो
जैसे तुम देखती हो
वैसे देखने को तुम्हारी सी नज़र चाहिए
प्यारी और शरारती

तुम में इतनी खूबियाँ हैं

मुझमें कोई खूबी नहीं 
मैं केवल कविता कहता हूँ
केवल तुम पे कविता कहता हूँ
पर तुम मानती हो इसे मेरी सबसे बड़ी खूबी
मुझे देती हो बच्चों सी हँसी
और देखती हो उस नज़र से
जिस नज़र से मुझे किसी ने नहीं देखा आज तक

तुम प्रेम भीगी हँसी लुटाती रहो

मैं प्यार लिपटे शब्द लुटाता रहूँगा
वादा !!!


नोट- साहिर लुधियानवी के गीत "तुम अगर साथ देने का वादा करो..मैं यूँही मस्त नगमें लुटाता रहूँ" वाले भाव से प्रेरित..

इनकमिंग फ्री - पंकज त्रिवेदी

मेरी "लाल रंग का फ़ोन" पर मित्र पंकज त्रिवेदी की कमेन्ट के रूप में लिखी गई कमाल कविता..
बचपन में देखा था मैंने लालजी बनिए के वहां एक फ़ोन
"लालजी फ़ोन वाला" जवाब होता था
जब पूछा जाता था लालजी कौन?
फ़ोन आने से पहले लालजी एक सामान्य दुकानदार था
ग्राहक उधार खा के जाते और लालजी को डांट भी पिलाते

पर फ़ोन आने से मैंने लालजी का रुतबा बांस की तरह बढते देखा

उधार कम और नकद ज़्यादा हो गया
डांट खत्म और सम्मान पैदा हो गया
क्योंकि अब लालजी सिर्फ दुकानदार नहीं
कईओं का राजदार था
उसके फ़ोन के ज़रिये होता था प्यार
प्यार का व्यापार
व्यापार का प्यार

उसके फोन पे हंस हंस के बाते करने वाली

और
हमें देख मुंह फेरने वाली हर लड़की चरित्रहीन होती थी
विश्वसनीय सूत्र बताते थे कि ऐसी लडकियां
सुबह फ़ोन पे बात करती थी
और
दोपहर में अपना चरित्र खोती थी
ये अलग बात है कि वो सारे विश्वसनीय सूत्र
उन लड़कियों के हाथों करारे चांटे खा चुके होते थे

उनमे से एक थी "वो"

पता नहीं कौन था जिससे "वो" इतनी बाते करती थी??
उस अनदेखे अनजान सामने वाले के लिए
बस्ती के हर जवान दिल पे "वांटेड" का पोस्टर छप चुका था
क्योंकि हरेक लड़का "वो" पाने के लिए हजारों जाप जप चुका था

अगर सामने वाला "हम" में से कोई होता

तो बस्ती के लोग अब तक उसकी तेरहवीं का खाना खा चुके होते
पर नहीं
"सामने वाला" कोई बाहरवाला था
जो हमारी "वो" को हमसे पहले बिगाड़ रहा था
आखिर एक दिन फोन पर हंस हंस के बात करती रूपा का पीछा किया गया

रूपा रंगे हाथ पकड़ी गयी
"सामने वाले" के साथ

रूपा के नंगे बदन को घूरते हुए
"मार डालो इस वहशी को"
"उम्र का लिहाज तो करता"
"दूकान जला डालो, मुंह काला कर दो"
जैसे वाक्य चिल्लाते हुए हम सब कब

"अरे लड़की ही कुलटा है"

"इसे ही मज़े का चस्का है तो कोई और क्या करे"
"अरे बेचारे लालाजी कहाँ गंद में फंस गए"
बोलने लगे
पता ही नहीं चला
क्यूँ???

क्योंकि किसी ने नौकरी की एप्लीकेशन में

किसी ने अपनी माशूका को
किसी ने रिश्तेदारों को
किसी ने गाँव में अकेली पत्नी को
किसी ने विदेश गए पति को
किसी ने अपने बॉस को
किसी ने अपने दोस्त को
लालजी बनिए का ही नंबर दिया हुआ था

इस घटना के बाद पुनः प्रतिष्ठित लालजी ने

जो पहले फोन आने पर भी हम सबसे पैसे लेता था
पैसे लेने बंद कर दिए
हमारा "इनकमिंग फ्री" करके उसका "आउट-गोइंग" जारी रहा

और सालों तक लालजी की दूकान पे लालजी से

"शिलाजीत के कमाल" के किस्से सुनते हुए
हम सब राह देखते रहे
इंटरव्यू के
प्रेमिका के
बॉस के
बछड़ा पैदा होने के
गाय मरने के
ऐसे वैसे कई तरह के
फ़ोनों की.......

पंकज त्रिवेदी

हमें शक्ति देना प्रभु -अश्वनी

मुझे साधारण लिखना है
इतना साधारण कि 
जब मेरा दिमाग कुंद हो जाए और दिल कमज़ोर
मैं तब भी अपने लिखे को समझ पाऊं

मैं इतना साधारण लिखना चाहता हूँ कि
बोझा उठाने वाला मज़दूर
मल्टी नैशनल कम्पनी का ऑफिसर
रेड लाइट एरिया की औरतें
कॉलेज के छात्र 
दुकानदार वेटर ठेलेवाले 
सब एक बार में समझ पाएं
सबको लगे कुछ अपना सा 
कुछ उनके दिल की बात

पर इतना साधारण भी नहीं लिखना मुझे
कि उसको समझ जाएँ भ्रष्ट वाले नेता
दोगले टाइप दलाल
सड़े हुए सूदखोर 
ज़ालिम जैसे पुलिसवाले 

जब तक मेरा लिखा
ऐसे लोगों से बचा रहेगा
तब तक बचा रहूँगा मैं
बची रहेगी मेरी कलम में स्याही 
बची रहेगी एक आस
मज़दूर वेश्या दुकानदार छात्र वेटर ऑफिसर ठेलेवाले 
के दिल में

हमें शक्ति देना प्रभु !!!

लाल रंग का फ़ोन - अश्वनी

मेरे पास एक हिंदी किताब है
मैं आँखें बंद कर उसे खोलता हूँ
किसी एक शब्द पे उंगली रखता हूँ
वो शब्द है.....फ़ोन

मैं आज इतना बुझा हूँ कि कुछ लिख के
खुद को जगाना चाहता हूँ
कोई कविता भाव या संवेदना दस्तक नहीं दे रहे
इसलिए आज के लिए मैंने एक खेल चुना है
जो शब्द मेरी उंगली के नीचे आएगा
मैं उसको ले के कुछ लिखूंगा

जब मैंने अपनी ज़िन्दगी का पहला फ़ोन घुमाया था
तो रांग नंबर लगा था
एक निहायत भूखे बच्चे को जैसे ढेर खाना मिल जाए
और वो इतना ठूंस ले कि सांस लेनी मुश्किल हो जाए
उसी तरह एक शादी समारोह में एक फ़ोन पा गया था मैं
एक दम अकेला आमंत्रण देता लाल रंग का फ़ोन
बड़ों को जो करते देखा था..वही करने लगा मैं भी
चोगा कान से लगा
उँगलियों से कुछ भी नंबर घुमाने लगा
अचानक कान में हैलो हैलो की आवाजें आई
और मेरा चेहरा पीला पड़ गया
दिल बूम बॉक्स की तरह बजने लगा
मुझे लगा कि आज पिटाई पक्की
मैं फ़ोन छोड़ के भागा
उसके बाद मैंने पेट दर्द का बहाना बना के
डैडी को जल्दी घर लौटने पे मजबूर किया

वो पेट दर्द मुझे कई दिन तक होता रहा
मुझे डर था चोरी पकड़े जाने का
इसलिए दर्द के पीछे छुपा रहा था मैं अपना डर
इस घटना के काफी सालों बाद हमारे घर पे भी फ़ोन लगा
पर इसमें उंगली फंसा के नंबर घुमाने वाला इंतजाम नहीं था
और इसका रंग भी काला था
काला कौआ कहीं का
पता नहीं क्यों
मैं अपने घर के फ़ोन को कभी पसंद नहीं कर पाया
वो लाल रंग का फ़ोन अब भी मेरे सपनों में आता है  

February 25, 2012

चाहत - अश्वनी

मिटना नसीब था
तुझपे मर मिटे

खुद को पाना था

तुझमें खो गए

इज़हारे मोहब्बत था

ज़ुबान खामोश रही

तू साया बन साथ थी

मैं अंधेरों में था
साया दिखा नहीं
महसूस हुआ

जब तूने बहुत देर थामे रखा हाथ

लकीरें बदलने लगीं
'अकेलेपन' की जगह
तेरा नाम उभर आया

तूने इतने समर्पण से मुझे चाहा

मुझे मोहब्बत पे यकीन होने लगा
तूने मुझे देखा 'उस' नज़र से
मुझे खुद पे यकीन होने लगा

जब तू आई जीवन में

मैंने एक बड़ा छाता खरीदा
अब से पहले एक छोटी छतरी बारिश के लिए थी

तेरे आने से

मैंने पहली बार जानी बहुत सी बातें
मैंने जाना कि
मैं खुद से ज़्यादा भी चाह सकता हूँ किसी को
खुद से ज़्यादा तुम पर भरोसा करता हूँ

तेरे आने से

बारिश,हवा,पहाड़,बादल,चाँद,घाटी,वादी,झरना,जंगल
जैसे शब्द
परिभाषित हुए

अब तुम अपना ज़्यादातर वक़्त मेरे संग बिताती हो

बंद आँखों से भी दिख जाती हो
आँखें खोलूँ
तब भी रहना सामने
हमेशा

February 23, 2012

साली ख़ुशी - अश्वनी

जब मुझे मेरे भीतर के भाव समझ नहीं आते
वो समय बहुत कठिन गुज़रता है मुझ पर...

जिसे मैं ग़ुस्सा समझ पी जाता हूँ
उसका स्वाद निराशा सा निकलता है
जिसे मैं निराशा समझ झटक देता हूँ
वो दरअसल कोई दबी कुंठा होती है
या मेरा इन्फीरीऑरिटी काम्प्लेक्स
जो कूबड़ की तरह लदा रहता है पीठ पर
कूबड़ को कोई झटक पाया है आज तक

जिसे मैं ख़ुशी मान झूमता हूँ
वो अक्सर शराब का नशा होता है
पैर थिरकते हैं
चेहरा मुस्कुराता है
दिल एब्सेंट माइंडेड सा डोलता है इधर उधर
दिल शरीक ना हो तो वो ख़ुशी हुई क्या

जिसे मैं अवसाद यानी डिप्रेशन मान दिनों-दिन पड़ा रहता हूँ बिस्तर में
वो किसी की याद निकलती है
अवसाद का रूप बना कर मुझे छलने आई छलना
मेरा सब कुछ लूट ले जाती है लुटेरी
ऐसी याद से तो मेमोरी लॉस भला

जिसे मैं चिंतन समझ के डूबा रहता हूँ सोच में
वो अक्सर होता है मेरा पलायन
सब से कट के अकेले में मुस्कराहट रहती है लबों पर
कभी कोई नगमा भी गुनगुनाने लगता हूँ मैं
दिल दोस्त सा साथ रहता है उन लम्हों
मेरा चिंतन पलायन असल में वेश बदल के आई ख़ुशी है
मेरे लिए बेहतर है कट के रहना

ये भाव भी बड़ा भाव खाते हैं
जैसे होते हैं
वैसे दिखते नहीं
जैसे दिखते हैं
वैसे होते नहीं
पर 
सौ बातों की एक बात

ख़ुशी आती रहे
चाहे हज़ार वेश बदल
सब रूप क़बूल उसके...

February 22, 2012

सपना उर्फ़ मेरी प्रेमिका - अश्वनी

एक सपना सता रहा था मुझे
पिछले कुछ दिनों से
एक धारावाहिक के रूप में ये सपना घटित हुआ है मेरी नींदों में...
पहले दिन एक लड़की पैदा हुई कहीं

दूसरे दिन वो लड़की बड़ी हुई
तीसरे दिन वो जवान हो गयी
जवान हुई तो पता चला कि मैं इस लड़की से प्यार करता हूँ...
पर चौथे दिन वो लड़की अधेड़ हो गयी मेरे सपने में
पांचवे दिन उसको घेर लिया कई तरह की बीमारियों ने
छठे दिन वो बूढ़ी जर्ज़र हो गई
सातवें दिन वो बिस्तर से लग गई
बस....
आठवें दिन से मैंने नहीं ली है एक भी झपकी
मुझे डर है और पक्का यकीन भी है कि
इस बार के सपने में मेरी प्रेमिका ले लगी मुझसे विदा सदा के लिए....
तब से ले के अब तक कई दिन बीत चुके हैं
और मैं अनिद्रा के अनशन पर बैठा हूँ
पानी के छींटे, कॉफ़ी, और नींद भगाने  वाली दवाइयों से मैंने नींद को दूर भगाया हुआ है..
इतना कुछ आपसे बांटने के बाद मेरे कुछ सवाल हैं
क्यूँ आते हैं सपने?
क्यूँ कोई लड़की बन जाती है प्रेमिका?
क्यूँ जाते हैं लोग?
क्यूँ किसी के जाने से इतना डरता है मन?
क्यूँ इतने सवाल हैं ज़िन्दगी में?
क्यूँ कुछ लोग सोते नहीं चैन से?
और मुझे भी नहीं सोने देते चैन से?

February 19, 2012

ग़ुलाम राजा- अश्वनी

देह मानचित्र सी
अपनी अपनी जगह घेरे अंग प्रत्यंग
स्वामी दिल
प्रहरी मस्तिष्क
शिराओं सी नदियाँ जोड़ती सबको परस्पर...

कोई आके तोड़ दे ये
व्यवस्था
अस्त व्यस्त कर दे मानचित्र
झुलसा दे देह
दमका दे देह
निखरा दे देह
सुला दे प्रहरी को
नदियों को डुबो दे पाताल में
और
स्वामी को बना ले अपना ग़ुलाम....

'उसकी' ग़ुलामी में दिल बल्लियों उछलता है
अहम् टूटता है तो वहम बिखर जाता है
हर दिल की कोई एक रानी
कोई एक राजा होता है..
दिल ग़ुलामी में हरदम जवान रहता है...

'स्वामी दिल' अकेलेपन का शिकार होता है
जल्दी बुढ़ा जाता है
अहम् वहम उसको झुकने नहीं देते
तनी अकड़ी गर्दन एक दिन भरभरा के ढह जाती है...

उम्र बीतने पे आई समझ, नासमझी है
जिनके पास अभी भी वक़्त बचा है
वो मेरे अनुभव से लाभ पाएं
दिल को किसी का ग़ुलाम बनाएं
इस बाज़ी में शह से ज़्यादा मज़ा मात में आता है
हथियार उठाने से
अधिक सुखद है समर्पण
तन-ने से बेहतर है बिछ जाना
अकड़ से अच्छी है पकड़...

इसलिए यहाँ कवितायें पढ़ने में समय ना गँवा के
कविता को खोजो
या
स्वयं बन जाओ कविता...

February 18, 2012

भोला दिल - अश्वनी

घर घर जा के हिंदी साहित्य की किताबें बेचता
कंधे पे टाँगे झोला
वो भोला..
मुंबई में सिर्फ खाने और शराब की होम डिलीवरी ही नहीं होती..
एक फ़ोन पे साहित्य भी घर आता है..
10 % की छूट पे..
हर बार सोचता हूँ एक-दो से ज़्यादा किताबें नहीं लूँगा..
क्योंकि भरा है घर पहले ही अत्यधिक किताबों से..

किताब रखने की जगह नज़र ही नहीं आती..
पर हर बार भोले का झोला आधा खाली हो जाता है..
और घर में जगह निकल आती है किताबें रखने की..
दरअसल यह जगह पहले मेरे दिल में बनती है..
फिर मेरा दिल बना लेता है थोड़ी जगह घर में भी..
दिल के अनोखे तहखाने हैं
जितने खोलो
उतने बढ़ते जाते हैं..
मेरा दिल मेरी सोच समझ को चित कर देता है
हमेशा...

February 17, 2012

यात्रा पात्र - अश्वनी

पिछली 6 फरवरी से 15 तक एक यात्रा में था..
इन 10 दिनों में खूब पैदल चला..
घूमने लायक जगहों पे घूमा..
लगभग हर रोज़ सुबह जल्दी उठा..
शाम थक के मालिशें करवाई..
तरह तरह की बीअरें पी..
झींगा,केकड़ा,बड़ी छोटी मछलियाँ
और तरह तरह के मांसाहारी शाकाहारी खाने खाए..
स्वादिष्ट अनोखे फल खाए..
बकरी का बोतलबंद दूध भी पीने मिला..
कभी तीखी मिर्ची से जीभ जलाई
कभी फल मिश्रित आइसक्रीम से ठंडक पाई..
सब था पास..
पर तीसरे चौथे दिन से ही घर की दाल रोटी बेतरह याद आने लगी..
मैं थाईलैंड में था.. 

February 5, 2012

करता क्यों ना मरता ? - अश्वनी

अधमुंदी आँख
बोझिल तन
घायल मन
दिमाग चौकन्ना

कर्मठ मैं
बढ़ते कदम
सामने मंजिल
दिल उदास

भरी जेब

खनखन सिक्के
बैंक बैलेंस
हाथ खाली

भरा परिवार

होम स्वीट होम
सब सुख
सब में तन्हा

नरम बिस्तर

धुली चादर
गागर में सागर
करवट रात

प्रशंसा भरपेट

उज्जवल भविष्य
बढ़ते आलिंगन
अछूती आत्मा

बाधा दौड़

निपुण धावक
गोल्डन ट्रॉफी
पस्त विचार

छप्पन भोग

लपलप जीभ
मुंह में पानी
मरी भूख

लम्बी गाड़ी

कॉस्टली शोफर
टंकी फुल
टायर पंचर

उत्साह जीवन

आँखों सपने
रेल ज़िन्दगी 

अझेल ज़िन्दगी

बिकता लेखन

डेली सोप
जम के पैसे
कौन कविता ?

दिमाग चौकन्ना
दिल उदास हाथ खाली सब में तन्हा करवट रात अछूती आत्मा पस्त विचार मरी भूख टायर पंचर अझेल ज़िन्दगी कौन कविता?

सुसाइड नोट.......
मुंह से झाग........


नोट- ऊपर लिखी सब घटनाएं काल्पनिक हैं..इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है..यदि आपको किसी के भीतर ऐसे लक्षण दिखें..तो वो महज़ एक संयोग है..

February 4, 2012

हर बार कविता नहीं होती - अश्वनी

अभी मैं कहने जा रहा हूँ कुछ ऐसी बातें 
जो बिलकुल साधारण हैं..
ऐसी बातें हर किसी के ज़हन में आती हैं..
ऐसे शब्द..ऐसी सोच..हर किसी के पास होती है..
इसमें कुछ भी नहीं है कविता जैसा..
पर धोखे से मंच पे चढ़ आए कवि की तरह 
अपनी बात कहके ही जाऊँगा..

काम में दिन रात डूब के पार उतरना निर्वाण है..
किसी को मोहब्बत में पा जाना खुदाई है..
लम्बी दौड़ में सुस्ताना रूहानी है..
प्यास में पानी अमृत है..
भूखे को रोटी जहान है..
धूप में साया सुकून है..
ना के बाद हाँ आनंद है..
यथार्थ में सपने प्राण हैं..
जीवन बाद मौत शान्ति है..
तेरे बिना जीवन मौत है..

देखा..मैंने कहा था ना
इसमें कुछ भी नहीं है कविता जैसा...

February 1, 2012

नो कविता डे - अश्वनी

जब मैं कवितायें लिख रहा होता हूँ तो समझ जाइए 
कि मैं उन दिनों में एक भी पैसा नहीं कमा रहा हूँ..
जब कविता पास होती है तो पैसा दूर भागता है...
जब पैसा कमाता हूँ तो कविता पास नहीं आती..
हालाँकि मैं लिख के ही पैसा कमाता हूँ..
पर वो लिखना अलग होता है..
उसमे सब कुछ होता है..
पर कविता नहीं होती..
मैं आजकल फिर से पैसा कमाने के लिए लिख रहा हूँ..
और कविता दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रही..
एक ही सवाल है मेरा आजकल..
ये लक्ष्मी और सरस्वती कभी हाथ मिलायेंगी क्या??

January 30, 2012

मेरे सवालों का जवाब दो..दो ना - अश्वनी

क्या आपको पता है?
केवल कॉकरोच रहेंगे जिंदा..
जब सब होंगे मुर्दा..

पर उस वक़्त क्या जिंदा होगा सच?
या झूठ बोल रहे होंगे कॉकरोच भी?
उस वक़्त भाई,भाई का गला काटेगा??
या वो सीख जायेंगे भाईचारे से रहना?

उस वक़्त भी क्या रूपया होगा सबका बाप?
या कॉकरोच बेकाम की वस्तु समझ के नकार देंगे उसको?
क्या उस वक़्त हो रहे होंगे प्रोपर्टी के झगड़े? 
या कॉकरोच मिल के रह रहे होंगे एक ही भूखंड पे?
उस वक़्त क्या हो रही होगी इन्फिडेलिटी?
या कॉकरोच सीख जायेंगे मोनोगैमी?

क्या उस वक़्त तक कॉकरोच समझ चुके होंगे कि 
इंसान था अजीब प्राणी..
जो जिंदा था..लड़ता था..मरता था..और मर गया..
ज़र जोरू ज़मीन पे... 

जो बात कॉकरोच समझेंगे हमारे जाने के बाद..
हम वो बात जीते जी समझ लें?
मैं सवाल बहुत पूछने लगा हूँ आजकल..
मुझे माफ़ करना..
पर जब बरसों से जवाब ना मिलें हों तो बहुत से सवाल हो जाते हैं इकट्ठा..