October 23, 2016

मध्यमवर्ग..

मध्यमवर्ग हावी है....
निराशा अवश्यम्भावी है !!! 


नोट- कृपया इन 2 पंक्तियों को पढ़कर आशावादी बनने की मुफ्त सलाह ना दें !!

July 29, 2016

ज़िद्दी परिंदा

बढ़ता पेट
घटता रेट
ज़ालिम सेठ

नींद बेवफ़ा
सपने सफा
उम्मीद रफा-दफा


हाथ में कंपन
पैर में झनझन
दिमाग में सनसन

पर

सोच है ज़िन्दा
ज़िद्दी परिंदा
बेपरवाह बाशिंदा
 
उड़ चला

आसमां
को
करने शर्मिंदा

July 28, 2016

कविता मेरी

दिल में जन्मी
बाज़ार में दम तोड़ गई
कविता मेरी

तू

किस्सा था
कहानी थी
याद नहीं

बचपन था
जवानी थी
याद नही


याद है
बस इतना

तू पास नहीं
तेरे आने की कोई
आस नहीं

July 27, 2016

फ़ितरत

ऑटो में बैठा तो
पैदल चलने वालों को हिकारत से देखा
कार में बैठ के ऑटो वालों पे गुस्सा आया
पैदल चला तो कार वाले को गाली दी

शुक्र है सड़कों पे जहाज़ नहीं चलते
वर्ना क़त्ल कर देता किसी का
जहाज़ में बैठ कर

July 11, 2016

काश......

कहीं घुमते-फिरते दिख जाता है कोई नया भूखंड
या कोई नया परिदृश्य या स्थान
तो लगता है ऐसे
कि
पा लिया सारा जहां
जीत ली सारी दुनिया

हालाँकि उन सभी भूखंडों परिदृश्यों-स्थानों पर
पड़ चुके होते हैं किसी के पाँव
पड़ चुकी होती है किसी की नज़र

और मैं उन जगहों पर चालाकी से अपने अकेले को
तस्वीर में कैद करके होता हूँ खुश
जैसे मैं ही हूँ 'पहला'
वहाँ कदम रखने वाला
जैसे मेरी नज़र ने ही देखा है वो नज़ारा सबसे 'पहले'

सोचता हूँ कि वास्कोडिगामा, कोलंबस
या उन्ही की तरह के कई दुर्लभ प्राणियों
को लगा होगा कैसा
जब सच में उन्ही के
कदम होंगे 'पहले'
किसी वर्जिन भूखंड को छूते हुए
उन्ही की नज़र होगी 'पहली'
किसी परिदृश्य का घूंघट उतारती हुई
उन्ही ने सूंघी होगी वहाँ की मिट्टी 'पहली' बार

उफ्फ... क्या फीलिंग होगी वो
लाख महसूस के भी महसूस नहीं सकता

काश..इस जनम में देख-छू-महसूस पाऊं
एक टुकड़ा इस जहां का
जहां ना पड़ी हो किसी की नज़र
ना छुएं हों कोई पाँव

काश...मैं भी वास्कोडिगामा हो जाऊं 
एक नितांत छोटे से भूखंड का

फिर भले ही वो हो मेरी कब्र
जहां का मैं ही होऊं 'पहला' बाशिंदा
काश....

March 8, 2016

एक चुप..सौ सुख

जब हर कुत्ता बिल्ला भोंक रहा था
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा
जब हर कोई सहिष्णुता असहिष्णुता पे अपने ब्यान ठोक रहा था
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा
जब हर रोज़ बदलते मुद्दों पे हो रही थी बहस-बसाई, मार-कुटाई(अदालत में)
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा
जब बन रहे थे गुट, और मांगी जा रही थी मेरी राय
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा
जब फतवे किये जा रहे थे जारी
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा
जब किसी की जुबान काटने की थी तैयारी
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा
जब देशद्रोही.देशप्रेमी,देशभक्त,देशवासी को लेके छिड़ा विवाद
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा


जब सफ़ेद को बताया काला और काले को सफ़ेद
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा


पर अब जब पानी सर के उपर से गुज़र रहा है
तब भी
मैंने चुप रह जाना बेहतर समझा

क्योंकी है मुझे मालूम है कि बोलूँगा अगर
तो करवा दिया जाऊँगा चुप

पर जैसे 'शहरयार' का दर्द था कि 'हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यों हैं
वैसे ही मेरा ज्वलंत सवाल था कि 'हर बोलने का अंजाम चुप क्यों है
और एक दिन
मैं अपने सवाल से जूझता हुआ जोश में भर के चिल्ला उठा
इन्कलाब जिंदाबाद...............

बस........
तब से मेरी जुबान पे लगी है बोली
कि अगर ये जुबां बोली तो चला देना गोली
कि बहुत मनाई रंगों से होली
इस बार मनाएंगे इस देशद्रोही की जुबां के खून से होली

अच्छा..अब ये ऊपरलिखित कविता-नुमा कुछ तो हो गया ना?? 
but seriously यार
मुझे क्यूँ लगता है डर कि
बोलूँगा अगर मैं
तो करवा दिया जाऊँगा चुप
और मेरी जुबां पे भी होगा
कुछ लाख का न सही
कुछ हज़ार का इनाम
या कुछ सौ का
या कुछ...

January 3, 2016

जब प्रेमिका पुकारे....'भाई साब'


जैसे बरसों बाद आइना देखो तो खुद को पहचानना होता है मुश्किल !!
वैसे ही कुछ साल बीत जाने के बाद अपनी लिखी कविताएं भी लगती हैं अपरिचित !!!

जैसे आइना पूछता है सवाल कि कहाँ थे इतने दिन !!
वैसे ही कविताएं कहती हैं कि आप कौन भाईसाब??

भले ही आइना ना देखो बरसों
पर कविता को मुंह ना दिखाना
नहीं है अच्छा

प्रेमिका जैसी होती है कविता
ब्रेक-अप हो जाए तो
ना दिमाग में आती है ना दिल में

फिर पुरानी कवितायों को पढ़ के ही दिल बहलाना पड़ता है
प्रेमिका के लिखे पुराने खतों की तरह !!


काफी समय बाद अपने ब्लॉग पर अपनी कविताएं पढने के बाद !!!

December 1, 2015

टीचर फटीचर पार्ट 2


फटीचर टीचरों के हाथों मार खा-खा कर हम बच्चे इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि हमें लगता था यही हमारी नियति है और सारे संसार के स्कूलों में भी बच्चों की इसी तरह पिटाई होती है..लेकिन कभी-कभार हमारी पुकार भी ऊपरवाले के कानों तक पहुँच जाती थी..हुआ यूँ कि हमारा संस्कृत टीचर( जिसका ज़िक्र मैं ‘टीचर फटीचर पार्ट 1’ में कर चुका हूँ) हमें पीट पीट कर इतना आनंद प्राप्त करने लगा था कि वो रोज़ाना क्लास में आते ही कुछ बच्चों को खड़ा कर लेता और अपने चिर परिचित घिनौने अंदाज़ में पहले बुरी तरह से हमारे कान मरोड़ता और फिर दोनों हाथों से हमारे दोनों गाल बजा देता और उसके बाद पढ़ाना शुरू करता..(वो शाष्त्री मास्टर अपनी इस पिटाई को परसाद देना बोलता था) अब पेट भर परसाद खाने के बाद हमारे पास और कुछ ज्ञान ग्रहण करने की शक्ति ना बचती..सो हम मन ही मन मास्टर जी के जल्दी मर जाने की कामना करते हुए गुमसुम से क्लास में बैठे रहते..

ये सब कुछ बदस्तूर चल रहा था और हम बच्चे दिन प्रतिदिन और अधिक गुमसुम होते जा रहे थे कि एक दिन पिताजी ने मेरा गुमसुम होना नोटिस किया और उसका कारण पूछा..यहाँ मैं बता देना चाहता हूँ कि मेरे पिताजी भी एक टीचर थे और संयोग से उसी स्कूल में गणित पढ़ाते थे..पर वो उतने जल्लाद और sadist टाइप के नहीं थे..हालाँकि उन्हें भी टयूशन पढ़ा कर अधिक पैसे कमाने की चाह थी लेकिन साथ ही साथ उन्हें ये डर भी लगता था की कहीं उनकी पिटाई से किसी बच्चे को कोई गंभीर चोट पहुँच गई तो फिर लेने के देने पड़ जायेंगे..उनके इस डर को दुसरे मास्टर उनकी कमज़ोरी कहते थे और ये मानते थे कि उनकी इस कमज़ोरी की वजह उनका जात से बनिया होना है..और अगर वो बनिए ना होकर जाट,पंजाबी,पंडित या सरदार होते तो बच्चों को वैसे ही धुनते जैसे बाकी मास्टर धुनते थे
 
बहरहाल मैंने रो रो कर पिताजी को अपना और दुसरे बच्चों की बुरी हालत का हाल बयान किया..और बताया कि शाष्त्री मास्टर किस तरह हमें क्लास शुरू होने से पहले पिटाई-परसाद खिलाता है..ज़ाहिर है पिताजी को बहुत गुस्सा आया और अगले ही दिन वो हमारी संस्कृत की क्लास में पहुँच गए..वहाँ उन्होंने कड़े शब्दों में शाष्त्री मास्टर को समझाया कि आज के बाद मेरे बच्चे को हाथ लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है..लेकिन शाष्त्री मास्टर भी घाघ था..वो पैंतरा लेते हुए बोला कि ये सब छोटी मोटी पिटाई तो मैं पढ़ाई के लिए करता हूँ..लेकिन अगर आपको अपने बच्चे को संस्कृत नहीं सिखानी तो ठीक है..मैं आज के बाद उसको कुछ नहीं कहूँगा..ये सुन कर पिताजी का कॉन्फिडेंस डगमगा गया और उन्होंने सवालिया निगाहों से मेरी तरफ देखा..पर मैंने ज़िन्दगी की सारी हिम्मत जुटा के कहा कि चाहे संस्कृत आये न आये..पर मुझे अब और मार नहीं खानी..शाष्त्री ने खा जाने वाली नज़रों से मुझे देखा..पर मैं अपनी बात पे कायम रहा और मेरी हिम्मत ने मुझे बचा लिया..

उस दिन के बाद शाष्त्री ने मुझे पूरी तरह से अनदेखा कर दिया..उसके लिए मैं क्लास में होते हुए भी वहाँ नहीं होता था..पर मुझे शाष्त्री की ये अनदेखी भा रही थी..मैं पिटाई से बच गया था और मज़े की बात ये कि पहले जो संस्कृत मुझे लाख समझाने पे समझ नहीं आ रही थी..वही संस्कृत अब मेरी दोस्त बन रही थी..

- to be continued...

October 4, 2015

कमाल है...

जब ज़िंदगी डेंगू, मलेरिया के साथ-साथ देश में फैल रही अराजकता के बीच कट रही थी !

जब यू-ट्यूब, फेसबुक और व्हाट्स-ऐप के वीडियो मनोरंजन कम और अशांत अधिक कर रहे थे !

जब स्वर्ग में बैठा भगवान 'स्वर्गवासी' नज़र आने लग गया था !

जब मन को समझाने के सारे उपाय निरुपाय हो रहे थे !

जब कोई किताब पढ़ना, पहाड़ चढ़ना हो रहा था !

तब मैं अपने बच्चे के साथ खेलकर मन बहलाने का प्रयास कर रहा था...और कमाल है, तमाम बड़ी असफलताओं के बीच मैं अपने इस छोटे-से प्रयास में सफल हो रहा था !!

September 25, 2015

उम्र चालीसा

ख़तरनाक पड़ाव है उम्र चालीस
ज़्यादा मांगती है
कम देती है

ना झपटने की ताक़त होती है
ना मांगने की हिम्मत होती है

बहुत ज़ोर लगाना पड़ता है
बहुत शोर मचाना पड़ता है
मन को घंटों मनाना पड़ता है
दिमाग को दाम दंड साम भेद से चुप कराना पड़ता है

कुछ बेवजह-सी गोलियां अलमारी में जगह बना लेती हैं
बची-खुची ईगो को ज़रूरत खा लेती है

बीते हुए दिन सपना लगते हैं
चल रहे दिन पहेली
आने वाले दिनों का भरोसा नहीं होता

अब या तो साली ये अवस्था बदले या साला मैं बदल जाऊं।

September 18, 2015

टीचर फटीचर (पार्ट-1)

ये सब मैं टीचर डे पर लिखना चाहता था, जब सारा फेसबुक टीचर नाम के एक प्राणी और एक उपाधि का महिमामंडन करने में लगा हुआ था। जो उपाधि हमारे समय में (मैं आज 40 का हूँ) ग्रेजुएशन या उस से भी कम पढ़ाई में मिल जाया करती थी और बिना किसी विशेष प्रतिभा के एक तुच्छ-सा प्राणी टीचर बन जाया करता था और हम बच्चों की ज़िंदगी नरक बनाने में जुट जाता था (ये स्थिति अब बदल गई है...ऐसा लगता तो नहीं)। 

मैं हरियाणा के एक छोटे कस्बे और एक गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ा हूँ, दसवीं तक। जहां के टीचर जाति के आधार पर गुट बनाकर अपना जीवन-यापन करते थे। कोई बनिया, कोई पंजाबी, कोई जाट तो कोई अनुसूचित जन-जाति की पहचान से ही जाना जाता था, जैसे कोई टीचर हिंदी या साइंस टीचर नहीं... बनिया, पंजाबी या जाट टीचर होता था। 

ये लगभग सभी तथाकथित टीचर अपना खाली समय (जोकि भरपूर होता था) चुगली, गुटबाज़ी और इसी तरह की अन्य गैरज़रूरी क्रियाओं में व्यतीत करते थे। इनका पसंदीदा मुद्दा होता था कि कौन मास्टर या बहनजी मतलब पुरुष टीचर और स्त्री टीचर कितनी ट्यूशन पढ़ाकर कितने पैसे कमा रहा है और कौन सिफ़ारिश से अपनी बदली रुकवाकर दूसरे की करवा देता है और कौन हेडमास्टर या प्रिंसिपल का आदमी है और कौन नहीं।

ऐसे स्कूलों में बच्चों की बुरी तरह पिटाई होना एक बहुत ही ज़्यादा आम बात थी और लगभग सभी टीचर अपने जीवन में कुछ ख़ास ना कर पाने का नहीं बल्कि कुछ ख़ास ना कमा पाने का सारा गुस्सा बच्चों की पीठ, गालों, चूतड़ों और पेट पे निकालते थे और इन स्थान विशेषों की जम के पिटाई होती थी। 

एक टीचर जिसका एक हाथ सन्नी देओल के ढाई किलो के हाथ से भी ढाई गुना भारी था, वो अपने दोनों हाथों को पूरी ताक़त से बच्चे के दोनों गालों पे एक साथ मारता था। उसकी दस की दस उंगलियाँ हमारे गालों पर छप जाती थीं और हमें काफी देर तक अपने कानों में सीटी बजने की आवाज़ सुनाई देती रहती थी। 

एक और सींखीया टीचर, जिसकी एक-एक हड्डी दिखाई देती थी और जो देखने में सूखी लकड़ी जैसा लगता था, जब वो हमारी पिटाई करता था तो पता नहीं कहाँ से उसके अन्दर एक ग़ज़ब की शक्ति आ जाती थी। वो हमें गर्मियों की भरी धूप में और सर्दियों में ठंडी जगह पे मुर्गा बना के हमारी डबल-रोटी को कभी पतली और कभी मोटी छड़ी से सेका करता था। हम बच्चे उसकी क्लास में आते ही सबसे पहले उसके हाथ की छड़ी को देखते थे कि आज ये यमदूत हमें कितनी मोटाई वाली छड़ी से पीटेगा। और यकीन मानिए कि साली पतली छड़ी की जो मार होती थी, उसके सामने मोटी छड़ी हमें (हमारी डबल-रोटी को) फूल की टहनी जैसी लगती थी। 

एक और संस्कृत का टीचर था जोकि ट्यूशन ना मिल पाने की भयंकर कुंठा में अपना जीवन बिता रहा था। क्योंकि उन दिनों में छात्र हिंदी, सामाजिक अध्ययन, संस्कृत जैसे अन्य विषयों की ट्यूशन नहीं रखा करते थे तो ये ज़हरबुझा टीचर अपना सारा ज़हर बच्चों के गालों पे उतार के अपना जीवन धन्य करता था। ये स्कूल या स्कूल के बाहर, गली, मोहल्ले, बाज़ार में कहीं भी किसी भी छात्र को पकड़ लेता था और काफी देर तक उसके दोनों कानों को रेडियो-ट्यून करने की तर्ज़ पे बुरी तरह मरोड़ता था। साथ में बहुत ही कमीनी मुस्कान के साथ बिना मतलब के हमारा हाल-चाल पूछता रहता था और जाते समय अपने दोनों हाथों से हमारे दोनों गाल लाल कर देता था। 

इस सारी पिटाई का एक मुख्य उद्देश्य होता था कि बच्चे को तब तक पीटो, जब तक कि वो थक के उस टीचर से ट्यूशन ना पढ़ने लग जाए। जो बच्चा जिस टीचर से ट्यूशन पढने लग जाता था, उसको उस टीचर की क्लास में अभयदान मिल जाता था और वो बिना बात की अमानुषिक पिटाई से बच जाता था। अगर उसको कभी मार पड़ती भी तो वो काफी हल्के हाथ की मार होती थी जिसको हम छोटी उम्र, पर मोटी खाल वाले बच्चे मार नहीं मास्टर जी का प्यार मान के चलते थे! 

- to be continued...

April 4, 2014

एक वरदान - अश्वनी


लम्बी उम्र की कामनाओं के बीच 
कुछ समय के लिए 
मर जाने का वरदान
मांग लूँ 
अगर कोई भगवान 
हो जाए मेहरबान 

लगातार दौड़ते दिमागी घोड़ों की 
तोड़ दूँ टांगें
लपर झपर ज़बान के 
पर दूँ क़तर 
बढ़ते कदम थाम 
हर प्रयास को दूँ आराम
बेकाम हो मेरा काम 
अनाम हो मेरा नाम

हर रोज़ की जीवन दुपहरी में
हर रोज़ मनाऊं शाम

January 7, 2013

बहुत दिन बाद - अश्वनी

लिखने से 
अच्छा है 
पढ़ना 

बोलने 
से 
सुनना

रूठने 
से 
मानना 

हटने 
से
जुड़ना 

बचने 
से 
जूझना 

गिनने 
से 
लुटाना 

ऊंघने  
से 
सोना 

सोने 
से 
जागना 

और  

तेरा हो कर ना होने 
से 
तेरा ना होना 

November 24, 2012

रोशनी के साथ जादू की झप्पी-अश्वनी


सूरजमुखी का फूल याद आते ही आंखों के सामने आ जाता है एक हंसता-खिलखिलाता चेहरा... आपने कभी ध्यान से सूरजमुखी को देखा है? ऐसा लगता है जैसे एक बड़ा-सा चेहरा चौड़ी मुस्कान लिए लहलहा रहा हो। कितना ख़ूबसूरत और असंख्य गुणों से भरपूर है सूरजमुखी! गंधरहित होकर भी अपने गुणों की सुगंध हर ओर फैलाता है। एक ऐसा फूल जो सूरज की पहली किरण को अपने भीतर संजो लेने के लिए उसकी ओर टकटकी लगाए बैठा रहता है, और फिर दिन भर जिधर सूरज घूमे उधर घूमता रहता है। सूरज छिप जाने के बाद अपनी पंखुड़ियों को समेटकर किसी साधु की तरह समाधि में चला जाता है।
सूर्य की किरणें इस प्राणी-जगत में एक नई ऊर्जा, एक नई रोशनी, एक नई सुबह का आग़ाज़ करती हैं, और सूरजमुखी इस बात की गवाही देता नज़र आता है कि प्रकृति तो भरपूर दे रही है, लेकिन ज़रूरत है बस उसकी तरफ नज़र घुमाने की। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो जीवन की एक बड़ी सीख देता लगता है सूरजमुखी। अक़्सर सुख और शांति हमारे इर्द-गिर्द ही होते हैं, लेकिन हम जीवन भर उसकी तरफ पीठ किए पड़े रहते हैं। जाने-अनजाने रोशनी को छोड़ अंधेरों की तरफ रुझान हो जाता है। ऐसे में सूरजमुखी को याद करें तो अंधरे से उजाले की ओर जाने का मन करेगा।
जब छोटा था तो छोटे शहर में रहता था। छोटे-से घर के बाहर बड़ी-सी कच्ची जगह होती थी। अभी बड़ा होकर बड़े शहर में हूं। छोटे-से घर के बाहर वाली कच्ची जगह का नामो-निशान नहीं है यहां। पर अभी भी बचपन के घर का वो बगीचा याद आता है जिसमें पिता जी ने एक दिन कहीं से सूरजमुखी के बीज लाकर बो दिए थे। कुछ दिन में वो बीज नन्हे पौधे बन गए और फिर वो पौधे बड़े होते गए। एक दिन उनका कद मुझसे भी बड़ा हो गया। मैंने उनका बढ़ना देखा था। वो मुझसे ऊंचे हो गए थे, पर वो मेरे दोस्त थे। अपने फूल मेरी तरफ झुकाते तो लगता कि मुझसे हैलो कर रहे हों। मैं दिन में कई-कई बार उनको देखने आता। हर बार यह पक्का करता कि उन्होंने सूरज की तरफ अपना मुंह मोड़ा हुआ है या नहीं... और उन्होंने मुझे कभी निराश नहीं किया। वो हर बार अपने नाम और ख्याति को सार्थक करते दिखते। जब वो थोड़े और बड़े हुए, पूरी तरह परिपक्व हो गए तो पिता जी ने उनके कुछ बीज निकालकर मुझे दिए। मैंने उन्हें छीला और मुंह में रख लिया। मुंह में जैसे रोशनी-सी घुल गई। वो स्वाद आज भी भुलाए नहीं भूलता। लेकिन आज मेरे पास चाहकर भी मेरे वो दोस्त नहीं हैं जिनसे मैं वो खाने के बीज मांग सकूं। आज सूरजमुखी के बारे में लिखते हुए मैं सोच रहा हूं कि मेरे घर में जो सूरजमुखी का तेल इस्तेमाल होता है, उसका कारण सूरजमुखी के गुण हैं या उनसे मेरी बचपन की दोस्ती... या शायद दोनों ही!
सूरजमुखी के खेत में जाएं तो लगता है कि कई नन्हे-नन्हे सूरज धरती पर खिल आए हैं। किसी उदास मन को कुछ देर सूरजमुखी के सान्निध्य में छोड़ दीजिए तो वही उदास मन हिलोरे लेने लगता है। इसके बीज ऐसे लगते हैं मानो इसकी आंखें हैं जो बड़ी मासूमियत से सुबह खुलती हैं... और इसका फूल ऐसे लगता है जैसे सूरज से कह रहा हो कि हे सूरज! ऐसे ही चमकते रहना। ऐसे ही अपनी प्राणवान शक्ति को जन-जन तक पहुंचाते रहना। मैं तुमसे यह वादा करता हूं कि हर कदम तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम्हारी रोशनी का अनुगमन करूंगा। तुम्हारे नाम से नाम पाया मैं सूरजमुखी हरसंभव कोशिश करूंगा कि मैं भी तुम्हारी तरह निराश, उदास दिलों में नवजीवन का एक छोटा-सा सूरज बनकर चमकता रहूं।’ 

(दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका 'अहा ज़िंदगी' के सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित) 

September 13, 2012

कमबख्त - अश्वनी

कविता लिखने कलम उठाई
मुद्दों विचारों सोचों
का मचा झंझावात
कलम रखी
सो गया

कमबख्त
नींद भी नहीं आई

August 20, 2012

तूने - अश्वनी

चन्द लम्हे  
कंपन से गुज़रा
हाथ
लकीरें गडमड हो गई
एक छोटी सी कंपन ने
तकदीर बदल डाली

गुनाह के रस्ते पे था 
अकेला 
भटकन थी डगर 
तूने पास बिठाया  
दो पल
तस्वीर बदल डाली 

कुछ घटनाओं को 
समझने लगा था 
प्यार 
एक बादल को बहार
तूने चंद की बातें
बादल छंट गया
तदबीर बदल डाली 

नाशुक्रा था 
सदा से
तेरा करम हुआ
सजदे में आ गया 
गिर गया ग़ुरूर
तहरीर बदल डाली 

August 16, 2012

घुमंतू - अश्वनी

घुमंतू आत्मा
कैद
शिथिल जिस्म में

घुमंतू सोच

कैद

कुंद दिमाग में

घुमंतू प्रेम

कैद
बासी सम्बन्ध में

घुमंतू नज़र

कैद
जबरन नकाब में

घुमंतू चाह

कैद
ओढ़ी आह में

घुमंतू घुमंतू

घुमंतू घुमंतू
रहूँ घुमंतू
सोचूं घुमंतू
चाहूँ घुमंतू
भोगूँ घुमंतू
पाऊं घुमंतू
देखूं घुमंतू
जियूं घुमंतू

घुमंतू घुमंतू

घुमंतू घुमंतू
भटकूँ घुमंतू
नष्ट घुमंतू
कष्ट घुमंतू
पस्त घुमंतू
शांत घुमंतू
मरूं घुमंतू
विलीन घुमंतू

अनदेखा घुमंतू

अनोखा घुमंतू

August 14, 2012

अक्षम आँख - अश्वनी

हलचल हुई
हिया हिला
ताके टुकुर टुकुर
अपना अक्स
झिलमिल झिलमिल
धुंधला धुंधला

हाथ बढ़ा पोछा आइना

आइना चमका
अक्स
धुंधला मगर

घाव अंदरूनी

इलाज बाहरी
नज़र पे जाला
नज़र नाकारा
दृष्टि प्राप्त करनी होगी
जो मार करे दूर तक
जो वार करे दूर तक

जब दिखेंगे भीतर के ज़ख़्म 

रखूंगा मरहम सा हाथ
हर लूँगा हर पीड़ा


पहले अपनी
फिर तेरी

July 24, 2012

काहे ? - अश्वनी















टिक टिक
टप टप
धप धप  
समय सरका
पानी बरसा
कदम धमका  
 
ठक ठक 
चिप चिप 
दिप दिप 
द्वार खटका 
बदन तमका
मुख चमका 

लप लप 
गट गट
छन छन  
स्वाद बहका 
गला चहका 
घूंघरू लहका 
 
सब है चलायमान 
सब है निरंतर 
सब है जारी 
सब है सदा
 
फिर क्यूँ दिल करे 
हूम हूम
क्यूँ न करे 
धक धक

July 17, 2012

ऐ - अश्वनी


सिलसिलो
टूटो

किस्मत
 
चमक
 
आह

कर असर

मेहनत

हो सफल

प्यार



ख़ुशी

ठहर

सोच

अच्छा सोच

समय

कट

संताप

घट

ऐ ज़िन्दगी

गले लगा ले

July 6, 2012

ऐसे कैसे चलेगा??? - अश्वनी

सीप सा जीवन
मोती चोरी लेकिन

हथेली बरक़रार

लकीरें गायब लेकिन

दिल प्रस्तुत

धड़कन शांत लेकिन

आंखें खुली
दृष्टि धुंधली
मगर

कदम कायम
राह अदृश्य किन्तु

सांस
सुरक्षित
साहस समाप्त परन्तु

जीवन जारी
जान जमींदोज पर

ऐसे कैसे चलेगा यार ???

July 2, 2012

मेरी इक नन्ही कहानी -अश्वनी

क़िस्से क़िस्म क़िस्म के
क़िस्म क़िस्म के लोग
लंबे लंबे क़िस्सों में
मेरी इक नन्ही कहानी
सांस लेने को निकालती मुंह
चादर से


तभी कोई बड़े गाव तकिये सा

किसी बड़े आदमी का 
बड़ा सा भारी क़िस्सा 
धप्प आके गिरता है
मेरी नन्ही कहानी के मुंह पर

मेरी कहानी एक चुटकुला बनके रह जाती है 

तब ना - अश्वनी

अगर मगर से पार होते
तब ना बोलते ओ.के
 
अंतु परन्तु किंतु से बचते
तब ना साथ आते

कैसे होगा,क्या होगा से हटते
तब ना कदम मिलाते 

झिझक को झटकते 
तब ना नज़र मिलाते

दूर की सोचते 
तब ना पास की समझते

थोड़ा कम सोचते 
तब ना थोड़ा सोच पाते

मौक़ा तो देते 
तब ना मौक़ा पाते 

क़ुदरत को महसूसते 
तब ना नदी बन बहते 

जीना जानते 
तब ना जीने देते 

मुझको समझते 
तब ना मुझको समझते 
मुझको जानते 
तब ना मुझको जानते

मुझको.....
तब ना.....

May 28, 2012

किस्मत हो सकता है इसका शीर्षक - अश्वनी

बहना नाँव की किस्मत है
डूबना भी
नदी की किस्मत है सागर
बाँध भी
चमकना चाँद की किस्मत है
ग्रहण भी
मिट्टी की किस्मत है जिस्म
खिलौना भी
धड़कना दिल की किस्मत है
टूटना भी
इज़हार की किस्मत है हाँ
ना भी
उड़ना पतंग की किस्मत है
कटना भी
किस्मत की किस्मत है खुल जाना
बंधना भी

मेरी किस्मत है तू

नहीं भी

May 8, 2012

ख़्वाबों में ख़्यालों में - अश्वनी

मेरी नींद में इक ख़्वाब है 
मेरी नींद इक ख़्वाब है 
ख़्वाब में अक्सर कह देता हूँ दिल की 
ख़्वाब में अक्सर समझता हूँ उसके दिल की

ख़्वाब की ज़ुबान जुदा है 
ख़्वाब में बहुत ज़्यादा बोलना सुनना नहीं पड़ता 
ख़्वाब बहुत समझदार होते हैं
इशारों को समझ जाते हैं
आँखों की हरकत
होंठों की जुंबिश
धड़कन की आवाज़
रूह की लरज़
दिल की तर्ज़
सब समझ जाते हैं

हकीकत में जो इश्क ख़्वाब लगे
ख़्वाब में वो हकीकत लगता है
ख़्वाब में सरहद वीज़ा नहीं होता
पूरी दुनिया पलों में घूम आता हूँ
ख्वाब में मैं हर जुबां बोल लेता हूँ 
ख़्वाब में मैं कहीं भी खुद को अजनबी नहीं पाता

इतना सही है ख़्वाब में जीना
तो
क्यूँ जीना पड़ता है हकीकत में
मैं ख़्वाब में जीने का ख़्वाब देखता हूँ
मैं अक्सर ख़्वाब में इक ख़्वाब देखता हूँ
मेरी नींद में इक ख़्वाब है 
मेरी नींद इक ख़्वाब है
ख़्वाब में अक्सर कह देता हूँ दिल की 
ख़्वाब में अक्सर समझता हूँ उसके दिल की

May 2, 2012

बिना यादों के - अश्वनी

यादों ने जब सताया 
यंत्रणा की हद तक
मैंने मांगी मन्नत
ख़तम हो यादें
पाताल में जाए यादों का सिलसिला
मन्नत हुई पूरी
एक सुबह जब जागा तो 
खुद को यादों से तन्हा पाया
दोपहर तक खुश रहा
शाम होते बेचैनी शुरू हुई
रात में बेचैनी तकलीफ बन गई
करवट में गई रात
सुबह मनहूस लगी
याद थी तो परेशान करती थी
नहीं है तो बर्बाद कर रही थी 
फिर उठे हाथ मन्नत को
याद रहने दे बाकी 
चाहे तो मिटा दे मुझको
पाताल में डाल मेरी हस्ती
पर मेरी यादें रखना जिंदा

यादों के बिना 
मिटा ही तो पड़ा था  
हस्ती भी कहाँ थी मेरी 
बिना यादों के

April 30, 2012

दिल -अश्वनी

रात दिन दस्तक दिल के दरवाज़े 
बंद कपाट खुले
दिल का आमंतरण दिल को दिल से
दिल मेज़बान दिल मेहमान 
दिल से परोसा दिल 
दिल से लगाया दिल 
दिल में शामिल दिल
दिल में समाया दिल 
रात दिन दिल ही दिल
बात मुलाकात दिल ही दिल 
दिल खिला रहे
दिल मिला रहे

दिल को समझे दिल
दिल की सुने दिल 
दिल,दिल से ना हो खाली
दिल में दिल बना रहे   

April 29, 2012

निर्णय - अश्वनी

मैं उसके आने की राह देखूं 
या
खुद ही पहुँच जाऊं उस तक

छुरा खरबूज़े पे गिरे
या
खरबूज़ा छुरे पर
क्या फ़र्क पड़ता है?

ये खरबूज़े वाली उदाहरण से 
अच्छी कोई उदाहरण हो तो बातिएगा
मुझे अभी यही सूझी
सो चिपका दी!!  

April 28, 2012

अच्छा दिन - अश्वनी

अच्छा दिन था
24 घंटे में ही पूरा हो गया
कुछ ढीठ दिन 
बरसों ख़तम नहीं होते

April 24, 2012

आप क्या कहते हैं? - अश्वनी

जागने सोने कि हद जब मिटने लगे 
तो 
सोया सोया जागूं 
और 
जागा जागा सोऊँ

मुझे अच्छा लगता है
होने और ना होने के बीचे होना 
मुझे अच्छा नहीं लगता है
होने और ना होने के बीचे होना

मुझे नफरत है 
होने और ना होने के बीच होने से
मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता 
होने और ना होने के बीचे होने से

एक ही स्थिति एक इंसान को 
कई तरह से प्रभावित करती है
जब तक जीवन है  
ये चरण लगे ही रहते हैं 
आप क्या कहते हैं ? 

April 23, 2012

मैं और तू - अश्वनी

बहुत दिन हुए खुद से बात हुए
बहुत दिन हुए तुमसे बात हुए
फुर्सत तुम्हे नहीं
फुर्सत हमें कहाँ
तेरा अपना जहां
मेरा अपना जहां 
तेरा रस्ता कहाँ 
मेरा रस्ता कहाँ

मिलना हो तो आना वहाँ
पहली बार मिले थे जहाँ 

बारिश - अश्वनी

बारिश में क्या है ऐसा
कि रही है तो
गुदगुदाती रहती है
ना आए तो इंतज़ार
और के हटी हो तो
खुशबू ,यादें और
किसी की याद
किसी और मौसम में ये बात कहाँ 

बारिश होती है जहाँ 
मैं खिलता हूँ वहाँ 
बारिश होती है जहाँ
मैं मिलता हूँ वहाँ

बारिश!!!
अच्छा नाम है ना?
यूनीक सा?

April 21, 2012

सपना रे - अश्वनी

मैं हर दिन कविता कह सकता हूँ
क्योंकि मैं हर रोज़ कोई न कोई सपना देखता हूँ
सपने को शब्द दे दो तो कविता हो सकती है
ऐसा मैंने पाया है


जैसे मेरा कल का सपना

इक नन्हा खेल रहा था गोद में
हुबहू मेरा अक्स
नन्हे हाथों से छूता मेरा चेहरा
जैसे छू रहा हो आइना
हैरान था अपना सा कोई देख कर
इक अपना सा बड़े चेहरे वाला

पर उस से ज़्यादा हैरान मैं था

कैसे सपने में दिखा गया वो मुझे
जो दिखा नहीं जीवन में
कैसे महसूस किया वो स्पर्श
कैसे आत्मसात हुई वो गंध
कैसे हुई वो अनुभूति

सपना देखते हुए सपना,सपना नहीं लगता

इसीलिए सपना लगता है मुझे कविता सा

जब घटित हो रही होती है तब

कविता भी कविता सी कहाँ लगती है

रूठा रूठी - अश्वनी

उसे सही से रूठना नहीं आता
पर मुझे आता है मनाना सही से
वो अक्सर रूठती है
बिना किसी विशेष कारण के
या फिर मेरे मनाने के लिए

मैं बहुत दिन से नहीं रूठा
मनाने में ही लगा रहता हूँ
मैं रूठना भूल गया हूँ

या शायद
वो कोई वजह ही नहीं देती मुझे रूठने की

प्रेमिका सी कविता - अश्वनी

प्रेमिका सी कविता
कई दिन के बाद मिलो तो
बात नहीं करती आसानी से
अनमनी सी रहती है
रूठी

धीरे धीरे खुलती है

पंखुड़ी सी
उलाहना सा देती है
मिलना नहीं था अक्सर
तो
क्यूँ जान पहचान बढ़ाई
फिर कहती है कि
आ ही गए हो तो बातें कर लो दो चार
फिर शरारती हंसी हंसती है
छूने लगती है बहाने बहाने
कहती है
मैं तो मज़ाक कर रही थी
मिलते हो तो अच्छा ही लगता है
चाहे सालों बाद मिलो
पर मिलना ऐसे ही
जैसे मिल रहे हो पहली बार
अजनबी मगर मेरे अजनबी
और हाँ
मुस्कुराना मत छोड़ना
तुम्हें मुस्कुराता देख तो पास आती हूँ तुम्हारे
अजनबी मगर मेरे अजनबी!!!

April 8, 2012

सोच का चक्का जाम - अश्वनी

झिलमिल तस्वीर दिखे जब साफ़ आँखों से
तब ख़लल दिमाग का है दोषी
दिमाग में घूमता इक सर्प
कुंडली मारे लपेटता है मगज़
स्पष्ट को करता धुंधला
धुंधले को करता और धुंधला


फिल्टर से छाना पानी

आत्मा कैसे छानूं?
साबुन से धोए हाथ
लहू कैसे धोऊँ?
डस्टर से झाड़ा बिस्तर
गिल्ट कैसे झाडूं?

ढक लिया तन
कैसे ढकूँ मन?
बुझा दी बत्ती
डर कैसे बुझाऊं?
पानी से साफ़ किया चेहरा
अक्स कैसे साफ़ करूँ?
सुला दिया जिस्म
विचार कैसे सुलाऊं?

बंद की आँख 
खिड़की कैसे बंद करूँ?
तोड़ दिया गिलास 
बोतल कैसे तोडूँ?
काट दी जीभ
आवाज़ कैसे काटूँ?
खाली किया जाम
सागर कैसे पीऊँ?
बीवी को मना लिया 
बच्चे को कैसे मनाऊँ?
बच्चे को मना लिया
बीवी को कैसे मनाऊँ?

जला दी किताब
कविता कैसे जलाऊं?

March 24, 2012

बहरूपिया -अश्वनी

मेरा मेरा मेरा 
इतना मेरा है ज़िन्दगी में 
कुछ और सुझाई नहीं देता
कुछ और दिखाई नहीं देता

कभी देखे जो तेरा इसका उसका 
उस दृष्टि पर उतर आया है मोतिया 
उस दिल में हो गई है ब्लोकेज 
धमनियों में जम गया है कचरा
जिस्म हुआ नाकारा
आत्मा पे छा गई है मौत

मैं तो चाहता था सबका भला
फिर कैसे हुआ इतना स्वार्थी
कहाँ से आया इतना मेरा मेरा मेरा

या तो दुबारा से शुरू हो सब
या मैं स्वीकार कर लूं वस्तुस्थिति
या मैं खोज पाऊं स्वार्थ का उदगम
या मैं बन जाऊं लठ यानि पीस ऑफ़ वुड

जो भीगता हो बारिश में
सूखता हो धूप में
टूटता हो कुल्हाड़ी से
जलता हो आग में
तड़क तड़क 
पर
चुपचाप
स्पन्दनहीन

या खुदा...
या तो चैन दे
नहीं तो उतर आ ज़मीं पर
और भोग मुझ सा जीवन
कहलाना बंद कर खुदा 
और जूझ 'मेरे' सवालों से
 
आह्ह्ह....तू नहीं है खुदा
जा माफ़ किया तुझे बहरूपिए

March 22, 2012

सिली ओल्ड मी - अश्वनी

फिर वही विचार
वही सोच
वही उधेड़बुन
अपनी पूंछ को मुंह में दबाने को
गोल गोल घूमता जैसे कुत्ता

पता नहीं क्यों 
जंगल बहुत आता है तस्वीर बन
ज़हन में
पर शांत नहीं अब जंगल
जल रहा है धूँ धूँ 
सुलग रहा है सूँ सूँ 
सुबक रहा है ऊँ ऊँ
बारिश चाहिए इसे 
जलन मिटे चुभन घटे रुदन हटे
या फिर ख़ाक हो जाए 
जड़ तक
नामोनिशान मिट जाए

कुछ बरस बाद जब खड़ी हो यहाँ इक टाउनशिप
तो उसके किसी फ्लैट के किसी कमरे में 
बूढ़े दादा दादी नाना नानी 
सुनाए इक जंगल की कहानी
वो जंगल जो जलता था उनके दिल में कभी
वो जंगल जो पलता था उनके दिल में कभी

कहानी सुनके हंसें बच्चे
हा हा हा हा हा 
आपस में करने लगें बातें 
कि
पगला गए हैं दादा दादी
और 
सठिया गए हैं नाना नानी
एकदम बच्चा समझते हैं हमें
कहीं होता है ऐसा जंगल?
जहां पेड़ ही पेड़ हों और बहुत से जानवर
सिली ओल्ड पीपल!!!
हा हा हा हा हा 

जंगल अब भी जल रहा है
सुलग रहा है
सुबक रहा है

नोट- आजकल ये बहुत हो रहा है मेरे साथ..कहीं के लिए निकलता हूँ..कहीं पहुँच जाता हूँ...मैं तो जंगल में सैर को निकला था..पर मैंने ये जंगल कब जला डाला..पता ही नहीं चला..सिली ओल्ड मी!!!

March 18, 2012

वैष्णव जनतो तेने कहिए जे -अश्वनी

कसमसाहट नहीं हटती
बैचनी नहीं घटती
बेसूकूनी नहीं जाती
कोई ऐसा है?
जो
शांत रहा हो..चैन से जिया हो..सुकून से गया हो
अगर ऐसा है कोई
तो
वही है भगवान..खुदा..परमात्मा..ईश्वर
मेरे लिए 

जो सूली पे लटका
आरी से काटा गया
कढाहे में उबाला गया
तमाम दुःख ज़ुल्म सहे
वो कैसा भगवान
भगवान सी शक्ति होती
तो चुन ना लेता अपने लिए तमाम सुविधायें
सुकून चैन और शान्ति

भगवान है या नहीं है
ये दुनिया भर में बहस का सबसे लोकप्रिय मुद्दा है
मैं कभी भी इस बहस में नहीं पड़ता
मैं हमेशा ये मान के चलता हूँ कि भगवान है
अक्षम सा सहमा सा
दबा कुचला उपेक्षित शोषित पीड़ित गरीब
जो आजकल कुछ ज़्यादा ही दिखाई पड़ने लगा है
वही है भगवान
स्वर्ग में प्रवेश निषेध है जिसका
जन्नत से धकिआया जिसको 
हर अच्छी सुंदर रमणीय जगह से निष्काषित
इंसान का रूप धर धरती पे पिसने को मजबूर 
सर्वहारा(सब कुछ हार गया हो जो)वर्ग का मनुष्य ही भगवान है दरअसल

अब देखो ना
कितना विवश और अक्षम है भगवान
कि जितना भी कोसो गलियाओ 
कुछ रीऐक्ट ही नहीं करता 
सही में चमत्कारी शक्तिशाली मायावी होता 
तो मुझे श्राप न दे देता?
मुझे बना देता 
तोता मेंढक या कबूतर 

नोट- मैं अपनी इस बात को बहुत देर तक और बहुत दूर तक ले जा सकता हूँ....पर मुझे पता है कि इस सफ़र में मेरे साथ कोई नहीं जाएगा..क्योंकि मेरे साथ वालों को हाज़िरी लगाने जाना है मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारे में...

ऐसे ही एक ख्याल - अश्वनी

रात हुई
नींद कहाँ?
सुबह आएगी
जाग कहाँ?
दिन होगा
काम कहाँ?
दोपहर होगी
आराम कहाँ?
शाम होगी
शाम कहाँ?
रात होगी
नींद कहाँ?
सपने भी कहाँ?
रात भी रात सी कहाँ?
मैं भी मुझ सा कहाँ?
तुम भी तुम सी कहाँ?
समय नहीं..कुछ और ही संचालित कर रहा है
तुझे भी
मुझे भी

March 14, 2012

दिल से रे - अश्वनी

अन्तरिक्ष अनोखा
दिल झरोखा
दिल ग्रह
दिल उपग्रह
दिल उल्का
दिल का तारामंडल
अन्तरिक्ष यात्री
दो दिलवाले
अन्तरिक्ष यान में बैठ
दिल की करें सैर

दिल से करें सैर 

घना समंदर

दिल के अन्दर
दिल घोंघा
दिल मछली
दिल मूंगा
दिल कछुआ
दिल सीप
अन्दर बैठे
दो मोती
दिल की करें बातें
दिल से करें बातें

बीहड़ जंगल

दिल मंगल मंगल
दिल बरगद
दिल पंछी
दिल झाड़ी
दिल शेर
दिल धरती 
दो बीज
उगने को आतुर
खिलने को आतुर
एक कली एक फूल

दिल के भोले  
दिल से भोले

गाता गगन

दिल मगन मगन
दिल हवा हवाई
दिल बादल आवारा
दिल घटा
दिल मौसम
दिल बारिश
भीगे दो दिलवाले
अंतस तक सराबोर

दिल का नाचा मोर
दिल से नाचा मोर

मंथन मन का

हासिल खला
रौंदा जिस्म
हासिल खला
खंगाली आत्मा
हासिल खला
लहू निचोड़ा
हासिल खला
अंत भला तो सब भला
अंत खला तो सब खला

March 13, 2012

तेरा साथ है तो - अश्वनी

तुम और मैं
जैसे
मैं और तुम
तुम मैं सी
मैं तुम सा

तुम मुझे समझ नहीं आती

मुझे तुम समझ नहीं पाती
समझ से हट के देखा
मैंने तुम्हें
तुमने मुझे
दोनों समझ गए
कुछ नहीं रखा समझ में

मैंने तेरे लिए लहू बहाना था

तुम मेरे माथे पे पसीना भी नहीं आने देती

तुम इंद्रधनुष रखती हो अपने साथ

बेरंग होता हूँ जब
कुछ रंग तोड़
करती हो रंगीन
मुझे

दो समानांतर रेखाएं इन्फिनिटी पे मिलती प्रतीत होती हैं

हम कुछ कदम बाद एक रेखा हो गए
रेखागणित का गणित
फ़ेल हुआ 

मुझे क़िस्मत पे नहीं था यकीन

क़िस्मत से मिली तुम
क़िस्मत चमक गई
मुझे क़िस्मत पे यकीन नहीं होता

वादा था मुलाक़ात का

थोड़ी सी बात का
बात अभी भी जारी है
मुलाक़ात अभी भी है
दो बातूनी मिल जाएँ
तो बात दूर तलक जाती है

प्रेम प्यार इश्क मोहब्बत

से बड़ा है
तेरा साथ 

March 6, 2012

कहीं - अश्वनी

इतनी बातें घुमड़ती हैं मन में
मन नहीं रहता तन में
देह छोड़
पकड़ इक अनजान डगर
वो फिरता है मारा मारा


कहीं वो चाहता है दिल देना
कहीं वो चाहता है जान लेना
कहीं उसको चुप्पी भाए
कहीं बिन बोले रहा न जाए
कहीं वो जला दे दुनिया
कहीं बजाता फिरे हरमुनिया
कहीं टकरा जाए चट्टान से
कहीं डर जाए आसमान से
कहीं संसद पे फेंके पत्थर
कहीं पत्थर से खाए ठोकर
कहीं बतिआये इंसान सा
कहीं लगे शमशान सा
कहीं बात करे दिल से
कहीं बात करे मुश्किल से
कहीं सपना देखे जन्नत का
कहीं गाली दे जन्नत को
कहीं प्यार को माने सबकुछ
कहीं प्यार लगे बेकार
कहीं दोस्त बनाता फिरे
कहीं दोस्त हटाता फिरे
कहीं पैसे को पाना चाहे
कहीं ज़िन्दगी को पाना चाहे
कहीं लिखना चाहे कविता
कहीं मिटाना चाहे कविता
कहीं सब कुछ भुलाना चाहे
कहीं भुला न पाए कुछ भी
कहीं जीना चाहे अनन्त
कहीं मिटना चाहे पर्यंत
कहीं चाहे प्रशंसा
कहीं मांगे भर्त्सना
कहीं प्यार करे जी भर
कहीं नफरत सा रहे अमर
कहीं योगी
कहीं भोगी
कहीं सतर्क
कहीं लापरवाह
कहीं सब जान
कहीं अनजान
कहीं उदार
कहीं संकुचित

मन की इतनी उड़ाने हैं

मैं तो बस डोर थामे हूँ
कभी देता हूँ ढ़ील
कभी कस लेता हूँ मुट्ठी
पर मन अपने मन का राजा है
थमी डोर काट देता है
बंधी मुट्ठी देता है खोल

अभी मुझे समझ नहीं आ रहा कि और क्या कहूं 

इतना पढ़के भी आपको समझ नहीं आ रहा 

तो
या तो ये मेरा कसूर है 

या
मैंने ग़लत लोगों के सामने पेश कर दिया अपना
'मन'

March 3, 2012

दैट्स वट आई लाइक द मोस्ट अबाउट यू - अश्वनी

तेरी हाँ से पहले मुझे लगने लगा था
मुझमें कुछ कमी है
मैं नहीं हूँ प्यार के काबिल
प्यार छूता था मुझे
पर गले नहीं लगता था

प्यार से आत्मविश्वास आता है
आत्मविश्वास से प्यार आता है
प्यार ना मिला तो आत्मविश्वास खोने लगा
आत्मविश्वास खोने लगा तो
प्यार की उम्मीद खोने लगी
इसी खोने पाने में तू आई
मेरी परिभाषाएं बदल डाली तूने
मेरी भाषाएँ बदल डाली तूने

तूने मुझे
पहले गले लगाया
बाद में छूआ
किसी दक्ष मनोवैज्ञानिक की तरह तूने मुझे समेट लिया
जब सबने मुझे समझ लिया था मुर्दा
तूने सांस में सांस भर दी
मेरी ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कर दी

अब अगर मैं कवि बनता हूँ
तुझपे कविता ग़ज़ल कहता हूँ
तुझे कविता ग़ज़ल कहता हूँ
तो कहता हूँ
किसी को अच्छा लगे तो लगे
ना लगे तो मेरी दास्ताँ सुन ले
उसके बाद भी अच्छा ना लगे
तो
मुझे क्या
और
तुझे भी क्या
 

तूने मुझे ऐरोगैंस सिखाई है
एंड
दैट्स वट आई लाइक द मोस्ट अबाउट यू

March 2, 2012

वादा- अश्वनी

तुम
तुम हो
जैसे तुम हँसती हो
वैसे हँसने को तुम्हारा सा दिल चाहिए
मासूम और सुंदर


तुम

तुम हो
जैसे तुम देखती हो
वैसे देखने को तुम्हारी सी नज़र चाहिए
प्यारी और शरारती

तुम में इतनी खूबियाँ हैं

मुझमें कोई खूबी नहीं 
मैं केवल कविता कहता हूँ
केवल तुम पे कविता कहता हूँ
पर तुम मानती हो इसे मेरी सबसे बड़ी खूबी
मुझे देती हो बच्चों सी हँसी
और देखती हो उस नज़र से
जिस नज़र से मुझे किसी ने नहीं देखा आज तक

तुम प्रेम भीगी हँसी लुटाती रहो

मैं प्यार लिपटे शब्द लुटाता रहूँगा
वादा !!!


नोट- साहिर लुधियानवी के गीत "तुम अगर साथ देने का वादा करो..मैं यूँही मस्त नगमें लुटाता रहूँ" वाले भाव से प्रेरित..

इनकमिंग फ्री - पंकज त्रिवेदी

मेरी "लाल रंग का फ़ोन" पर मित्र पंकज त्रिवेदी की कमेन्ट के रूप में लिखी गई कमाल कविता..
बचपन में देखा था मैंने लालजी बनिए के वहां एक फ़ोन
"लालजी फ़ोन वाला" जवाब होता था
जब पूछा जाता था लालजी कौन?
फ़ोन आने से पहले लालजी एक सामान्य दुकानदार था
ग्राहक उधार खा के जाते और लालजी को डांट भी पिलाते

पर फ़ोन आने से मैंने लालजी का रुतबा बांस की तरह बढते देखा

उधार कम और नकद ज़्यादा हो गया
डांट खत्म और सम्मान पैदा हो गया
क्योंकि अब लालजी सिर्फ दुकानदार नहीं
कईओं का राजदार था
उसके फ़ोन के ज़रिये होता था प्यार
प्यार का व्यापार
व्यापार का प्यार

उसके फोन पे हंस हंस के बाते करने वाली

और
हमें देख मुंह फेरने वाली हर लड़की चरित्रहीन होती थी
विश्वसनीय सूत्र बताते थे कि ऐसी लडकियां
सुबह फ़ोन पे बात करती थी
और
दोपहर में अपना चरित्र खोती थी
ये अलग बात है कि वो सारे विश्वसनीय सूत्र
उन लड़कियों के हाथों करारे चांटे खा चुके होते थे

उनमे से एक थी "वो"

पता नहीं कौन था जिससे "वो" इतनी बाते करती थी??
उस अनदेखे अनजान सामने वाले के लिए
बस्ती के हर जवान दिल पे "वांटेड" का पोस्टर छप चुका था
क्योंकि हरेक लड़का "वो" पाने के लिए हजारों जाप जप चुका था

अगर सामने वाला "हम" में से कोई होता

तो बस्ती के लोग अब तक उसकी तेरहवीं का खाना खा चुके होते
पर नहीं
"सामने वाला" कोई बाहरवाला था
जो हमारी "वो" को हमसे पहले बिगाड़ रहा था
आखिर एक दिन फोन पर हंस हंस के बात करती रूपा का पीछा किया गया

रूपा रंगे हाथ पकड़ी गयी
"सामने वाले" के साथ

रूपा के नंगे बदन को घूरते हुए
"मार डालो इस वहशी को"
"उम्र का लिहाज तो करता"
"दूकान जला डालो, मुंह काला कर दो"
जैसे वाक्य चिल्लाते हुए हम सब कब

"अरे लड़की ही कुलटा है"

"इसे ही मज़े का चस्का है तो कोई और क्या करे"
"अरे बेचारे लालाजी कहाँ गंद में फंस गए"
बोलने लगे
पता ही नहीं चला
क्यूँ???

क्योंकि किसी ने नौकरी की एप्लीकेशन में

किसी ने अपनी माशूका को
किसी ने रिश्तेदारों को
किसी ने गाँव में अकेली पत्नी को
किसी ने विदेश गए पति को
किसी ने अपने बॉस को
किसी ने अपने दोस्त को
लालजी बनिए का ही नंबर दिया हुआ था

इस घटना के बाद पुनः प्रतिष्ठित लालजी ने

जो पहले फोन आने पर भी हम सबसे पैसे लेता था
पैसे लेने बंद कर दिए
हमारा "इनकमिंग फ्री" करके उसका "आउट-गोइंग" जारी रहा

और सालों तक लालजी की दूकान पे लालजी से

"शिलाजीत के कमाल" के किस्से सुनते हुए
हम सब राह देखते रहे
इंटरव्यू के
प्रेमिका के
बॉस के
बछड़ा पैदा होने के
गाय मरने के
ऐसे वैसे कई तरह के
फ़ोनों की.......

पंकज त्रिवेदी

हमें शक्ति देना प्रभु -अश्वनी

मुझे साधारण लिखना है
इतना साधारण कि 
जब मेरा दिमाग कुंद हो जाए और दिल कमज़ोर
मैं तब भी अपने लिखे को समझ पाऊं

मैं इतना साधारण लिखना चाहता हूँ कि
बोझा उठाने वाला मज़दूर
मल्टी नैशनल कम्पनी का ऑफिसर
रेड लाइट एरिया की औरतें
कॉलेज के छात्र 
दुकानदार वेटर ठेलेवाले 
सब एक बार में समझ पाएं
सबको लगे कुछ अपना सा 
कुछ उनके दिल की बात

पर इतना साधारण भी नहीं लिखना मुझे
कि उसको समझ जाएँ भ्रष्ट वाले नेता
दोगले टाइप दलाल
सड़े हुए सूदखोर 
ज़ालिम जैसे पुलिसवाले 

जब तक मेरा लिखा
ऐसे लोगों से बचा रहेगा
तब तक बचा रहूँगा मैं
बची रहेगी मेरी कलम में स्याही 
बची रहेगी एक आस
मज़दूर वेश्या दुकानदार छात्र वेटर ऑफिसर ठेलेवाले 
के दिल में

हमें शक्ति देना प्रभु !!!

लाल रंग का फ़ोन - अश्वनी

मेरे पास एक हिंदी किताब है
मैं आँखें बंद कर उसे खोलता हूँ
किसी एक शब्द पे उंगली रखता हूँ
वो शब्द है.....फ़ोन

मैं आज इतना बुझा हूँ कि कुछ लिख के
खुद को जगाना चाहता हूँ
कोई कविता भाव या संवेदना दस्तक नहीं दे रहे
इसलिए आज के लिए मैंने एक खेल चुना है
जो शब्द मेरी उंगली के नीचे आएगा
मैं उसको ले के कुछ लिखूंगा

जब मैंने अपनी ज़िन्दगी का पहला फ़ोन घुमाया था
तो रांग नंबर लगा था
एक निहायत भूखे बच्चे को जैसे ढेर खाना मिल जाए
और वो इतना ठूंस ले कि सांस लेनी मुश्किल हो जाए
उसी तरह एक शादी समारोह में एक फ़ोन पा गया था मैं
एक दम अकेला आमंत्रण देता लाल रंग का फ़ोन
बड़ों को जो करते देखा था..वही करने लगा मैं भी
चोगा कान से लगा
उँगलियों से कुछ भी नंबर घुमाने लगा
अचानक कान में हैलो हैलो की आवाजें आई
और मेरा चेहरा पीला पड़ गया
दिल बूम बॉक्स की तरह बजने लगा
मुझे लगा कि आज पिटाई पक्की
मैं फ़ोन छोड़ के भागा
उसके बाद मैंने पेट दर्द का बहाना बना के
डैडी को जल्दी घर लौटने पे मजबूर किया

वो पेट दर्द मुझे कई दिन तक होता रहा
मुझे डर था चोरी पकड़े जाने का
इसलिए दर्द के पीछे छुपा रहा था मैं अपना डर
इस घटना के काफी सालों बाद हमारे घर पे भी फ़ोन लगा
पर इसमें उंगली फंसा के नंबर घुमाने वाला इंतजाम नहीं था
और इसका रंग भी काला था
काला कौआ कहीं का
पता नहीं क्यों
मैं अपने घर के फ़ोन को कभी पसंद नहीं कर पाया
वो लाल रंग का फ़ोन अब भी मेरे सपनों में आता है