August 14, 2012

अक्षम आँख - अश्वनी

हलचल हुई
हिया हिला
ताके टुकुर टुकुर
अपना अक्स
झिलमिल झिलमिल
धुंधला धुंधला

हाथ बढ़ा पोछा आइना

आइना चमका
अक्स
धुंधला मगर

घाव अंदरूनी

इलाज बाहरी
नज़र पे जाला
नज़र नाकारा
दृष्टि प्राप्त करनी होगी
जो मार करे दूर तक
जो वार करे दूर तक

जब दिखेंगे भीतर के ज़ख़्म 

रखूंगा मरहम सा हाथ
हर लूँगा हर पीड़ा


पहले अपनी
फिर तेरी

2 comments:

  1. वाह अश्विनी ....कठिन और मजेदार रचना.

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  2. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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