March 24, 2012

बहरूपिया -अश्वनी

मेरा मेरा मेरा 
इतना मेरा है ज़िन्दगी में 
कुछ और सुझाई नहीं देता
कुछ और दिखाई नहीं देता

कभी देखे जो तेरा इसका उसका 
उस दृष्टि पर उतर आया है मोतिया 
उस दिल में हो गई है ब्लोकेज 
धमनियों में जम गया है कचरा
जिस्म हुआ नाकारा
आत्मा पे छा गई है मौत

मैं तो चाहता था सबका भला
फिर कैसे हुआ इतना स्वार्थी
कहाँ से आया इतना मेरा मेरा मेरा

या तो दुबारा से शुरू हो सब
या मैं स्वीकार कर लूं वस्तुस्थिति
या मैं खोज पाऊं स्वार्थ का उदगम
या मैं बन जाऊं लठ यानि पीस ऑफ़ वुड

जो भीगता हो बारिश में
सूखता हो धूप में
टूटता हो कुल्हाड़ी से
जलता हो आग में
तड़क तड़क 
पर
चुपचाप
स्पन्दनहीन

या खुदा...
या तो चैन दे
नहीं तो उतर आ ज़मीं पर
और भोग मुझ सा जीवन
कहलाना बंद कर खुदा 
और जूझ 'मेरे' सवालों से
 
आह्ह्ह....तू नहीं है खुदा
जा माफ़ किया तुझे बहरूपिए

March 22, 2012

सिली ओल्ड मी - अश्वनी

फिर वही विचार
वही सोच
वही उधेड़बुन
अपनी पूंछ को मुंह में दबाने को
गोल गोल घूमता जैसे कुत्ता

पता नहीं क्यों 
जंगल बहुत आता है तस्वीर बन
ज़हन में
पर शांत नहीं अब जंगल
जल रहा है धूँ धूँ 
सुलग रहा है सूँ सूँ 
सुबक रहा है ऊँ ऊँ
बारिश चाहिए इसे 
जलन मिटे चुभन घटे रुदन हटे
या फिर ख़ाक हो जाए 
जड़ तक
नामोनिशान मिट जाए

कुछ बरस बाद जब खड़ी हो यहाँ इक टाउनशिप
तो उसके किसी फ्लैट के किसी कमरे में 
बूढ़े दादा दादी नाना नानी 
सुनाए इक जंगल की कहानी
वो जंगल जो जलता था उनके दिल में कभी
वो जंगल जो पलता था उनके दिल में कभी

कहानी सुनके हंसें बच्चे
हा हा हा हा हा 
आपस में करने लगें बातें 
कि
पगला गए हैं दादा दादी
और 
सठिया गए हैं नाना नानी
एकदम बच्चा समझते हैं हमें
कहीं होता है ऐसा जंगल?
जहां पेड़ ही पेड़ हों और बहुत से जानवर
सिली ओल्ड पीपल!!!
हा हा हा हा हा 

जंगल अब भी जल रहा है
सुलग रहा है
सुबक रहा है

नोट- आजकल ये बहुत हो रहा है मेरे साथ..कहीं के लिए निकलता हूँ..कहीं पहुँच जाता हूँ...मैं तो जंगल में सैर को निकला था..पर मैंने ये जंगल कब जला डाला..पता ही नहीं चला..सिली ओल्ड मी!!!

March 18, 2012

वैष्णव जनतो तेने कहिए जे -अश्वनी

कसमसाहट नहीं हटती
बैचनी नहीं घटती
बेसूकूनी नहीं जाती
कोई ऐसा है?
जो
शांत रहा हो..चैन से जिया हो..सुकून से गया हो
अगर ऐसा है कोई
तो
वही है भगवान..खुदा..परमात्मा..ईश्वर
मेरे लिए 

जो सूली पे लटका
आरी से काटा गया
कढाहे में उबाला गया
तमाम दुःख ज़ुल्म सहे
वो कैसा भगवान
भगवान सी शक्ति होती
तो चुन ना लेता अपने लिए तमाम सुविधायें
सुकून चैन और शान्ति

भगवान है या नहीं है
ये दुनिया भर में बहस का सबसे लोकप्रिय मुद्दा है
मैं कभी भी इस बहस में नहीं पड़ता
मैं हमेशा ये मान के चलता हूँ कि भगवान है
अक्षम सा सहमा सा
दबा कुचला उपेक्षित शोषित पीड़ित गरीब
जो आजकल कुछ ज़्यादा ही दिखाई पड़ने लगा है
वही है भगवान
स्वर्ग में प्रवेश निषेध है जिसका
जन्नत से धकिआया जिसको 
हर अच्छी सुंदर रमणीय जगह से निष्काषित
इंसान का रूप धर धरती पे पिसने को मजबूर 
सर्वहारा(सब कुछ हार गया हो जो)वर्ग का मनुष्य ही भगवान है दरअसल

अब देखो ना
कितना विवश और अक्षम है भगवान
कि जितना भी कोसो गलियाओ 
कुछ रीऐक्ट ही नहीं करता 
सही में चमत्कारी शक्तिशाली मायावी होता 
तो मुझे श्राप न दे देता?
मुझे बना देता 
तोता मेंढक या कबूतर 

नोट- मैं अपनी इस बात को बहुत देर तक और बहुत दूर तक ले जा सकता हूँ....पर मुझे पता है कि इस सफ़र में मेरे साथ कोई नहीं जाएगा..क्योंकि मेरे साथ वालों को हाज़िरी लगाने जाना है मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारे में...

ऐसे ही एक ख्याल - अश्वनी

रात हुई
नींद कहाँ?
सुबह आएगी
जाग कहाँ?
दिन होगा
काम कहाँ?
दोपहर होगी
आराम कहाँ?
शाम होगी
शाम कहाँ?
रात होगी
नींद कहाँ?
सपने भी कहाँ?
रात भी रात सी कहाँ?
मैं भी मुझ सा कहाँ?
तुम भी तुम सी कहाँ?
समय नहीं..कुछ और ही संचालित कर रहा है
तुझे भी
मुझे भी

March 14, 2012

दिल से रे - अश्वनी

अन्तरिक्ष अनोखा
दिल झरोखा
दिल ग्रह
दिल उपग्रह
दिल उल्का
दिल का तारामंडल
अन्तरिक्ष यात्री
दो दिलवाले
अन्तरिक्ष यान में बैठ
दिल की करें सैर

दिल से करें सैर 

घना समंदर

दिल के अन्दर
दिल घोंघा
दिल मछली
दिल मूंगा
दिल कछुआ
दिल सीप
अन्दर बैठे
दो मोती
दिल की करें बातें
दिल से करें बातें

बीहड़ जंगल

दिल मंगल मंगल
दिल बरगद
दिल पंछी
दिल झाड़ी
दिल शेर
दिल धरती 
दो बीज
उगने को आतुर
खिलने को आतुर
एक कली एक फूल

दिल के भोले  
दिल से भोले

गाता गगन

दिल मगन मगन
दिल हवा हवाई
दिल बादल आवारा
दिल घटा
दिल मौसम
दिल बारिश
भीगे दो दिलवाले
अंतस तक सराबोर

दिल का नाचा मोर
दिल से नाचा मोर

मंथन मन का

हासिल खला
रौंदा जिस्म
हासिल खला
खंगाली आत्मा
हासिल खला
लहू निचोड़ा
हासिल खला
अंत भला तो सब भला
अंत खला तो सब खला

March 13, 2012

तेरा साथ है तो - अश्वनी

तुम और मैं
जैसे
मैं और तुम
तुम मैं सी
मैं तुम सा

तुम मुझे समझ नहीं आती

मुझे तुम समझ नहीं पाती
समझ से हट के देखा
मैंने तुम्हें
तुमने मुझे
दोनों समझ गए
कुछ नहीं रखा समझ में

मैंने तेरे लिए लहू बहाना था

तुम मेरे माथे पे पसीना भी नहीं आने देती

तुम इंद्रधनुष रखती हो अपने साथ

बेरंग होता हूँ जब
कुछ रंग तोड़
करती हो रंगीन
मुझे

दो समानांतर रेखाएं इन्फिनिटी पे मिलती प्रतीत होती हैं

हम कुछ कदम बाद एक रेखा हो गए
रेखागणित का गणित
फ़ेल हुआ 

मुझे क़िस्मत पे नहीं था यकीन

क़िस्मत से मिली तुम
क़िस्मत चमक गई
मुझे क़िस्मत पे यकीन नहीं होता

वादा था मुलाक़ात का

थोड़ी सी बात का
बात अभी भी जारी है
मुलाक़ात अभी भी है
दो बातूनी मिल जाएँ
तो बात दूर तलक जाती है

प्रेम प्यार इश्क मोहब्बत

से बड़ा है
तेरा साथ 

March 6, 2012

कहीं - अश्वनी

इतनी बातें घुमड़ती हैं मन में
मन नहीं रहता तन में
देह छोड़
पकड़ इक अनजान डगर
वो फिरता है मारा मारा


कहीं वो चाहता है दिल देना
कहीं वो चाहता है जान लेना
कहीं उसको चुप्पी भाए
कहीं बिन बोले रहा न जाए
कहीं वो जला दे दुनिया
कहीं बजाता फिरे हरमुनिया
कहीं टकरा जाए चट्टान से
कहीं डर जाए आसमान से
कहीं संसद पे फेंके पत्थर
कहीं पत्थर से खाए ठोकर
कहीं बतिआये इंसान सा
कहीं लगे शमशान सा
कहीं बात करे दिल से
कहीं बात करे मुश्किल से
कहीं सपना देखे जन्नत का
कहीं गाली दे जन्नत को
कहीं प्यार को माने सबकुछ
कहीं प्यार लगे बेकार
कहीं दोस्त बनाता फिरे
कहीं दोस्त हटाता फिरे
कहीं पैसे को पाना चाहे
कहीं ज़िन्दगी को पाना चाहे
कहीं लिखना चाहे कविता
कहीं मिटाना चाहे कविता
कहीं सब कुछ भुलाना चाहे
कहीं भुला न पाए कुछ भी
कहीं जीना चाहे अनन्त
कहीं मिटना चाहे पर्यंत
कहीं चाहे प्रशंसा
कहीं मांगे भर्त्सना
कहीं प्यार करे जी भर
कहीं नफरत सा रहे अमर
कहीं योगी
कहीं भोगी
कहीं सतर्क
कहीं लापरवाह
कहीं सब जान
कहीं अनजान
कहीं उदार
कहीं संकुचित

मन की इतनी उड़ाने हैं

मैं तो बस डोर थामे हूँ
कभी देता हूँ ढ़ील
कभी कस लेता हूँ मुट्ठी
पर मन अपने मन का राजा है
थमी डोर काट देता है
बंधी मुट्ठी देता है खोल

अभी मुझे समझ नहीं आ रहा कि और क्या कहूं 

इतना पढ़के भी आपको समझ नहीं आ रहा 

तो
या तो ये मेरा कसूर है 

या
मैंने ग़लत लोगों के सामने पेश कर दिया अपना
'मन'

March 3, 2012

दैट्स वट आई लाइक द मोस्ट अबाउट यू - अश्वनी

तेरी हाँ से पहले मुझे लगने लगा था
मुझमें कुछ कमी है
मैं नहीं हूँ प्यार के काबिल
प्यार छूता था मुझे
पर गले नहीं लगता था

प्यार से आत्मविश्वास आता है
आत्मविश्वास से प्यार आता है
प्यार ना मिला तो आत्मविश्वास खोने लगा
आत्मविश्वास खोने लगा तो
प्यार की उम्मीद खोने लगी
इसी खोने पाने में तू आई
मेरी परिभाषाएं बदल डाली तूने
मेरी भाषाएँ बदल डाली तूने

तूने मुझे
पहले गले लगाया
बाद में छूआ
किसी दक्ष मनोवैज्ञानिक की तरह तूने मुझे समेट लिया
जब सबने मुझे समझ लिया था मुर्दा
तूने सांस में सांस भर दी
मेरी ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कर दी

अब अगर मैं कवि बनता हूँ
तुझपे कविता ग़ज़ल कहता हूँ
तुझे कविता ग़ज़ल कहता हूँ
तो कहता हूँ
किसी को अच्छा लगे तो लगे
ना लगे तो मेरी दास्ताँ सुन ले
उसके बाद भी अच्छा ना लगे
तो
मुझे क्या
और
तुझे भी क्या
 

तूने मुझे ऐरोगैंस सिखाई है
एंड
दैट्स वट आई लाइक द मोस्ट अबाउट यू

March 2, 2012

वादा- अश्वनी

तुम
तुम हो
जैसे तुम हँसती हो
वैसे हँसने को तुम्हारा सा दिल चाहिए
मासूम और सुंदर


तुम

तुम हो
जैसे तुम देखती हो
वैसे देखने को तुम्हारी सी नज़र चाहिए
प्यारी और शरारती

तुम में इतनी खूबियाँ हैं

मुझमें कोई खूबी नहीं 
मैं केवल कविता कहता हूँ
केवल तुम पे कविता कहता हूँ
पर तुम मानती हो इसे मेरी सबसे बड़ी खूबी
मुझे देती हो बच्चों सी हँसी
और देखती हो उस नज़र से
जिस नज़र से मुझे किसी ने नहीं देखा आज तक

तुम प्रेम भीगी हँसी लुटाती रहो

मैं प्यार लिपटे शब्द लुटाता रहूँगा
वादा !!!


नोट- साहिर लुधियानवी के गीत "तुम अगर साथ देने का वादा करो..मैं यूँही मस्त नगमें लुटाता रहूँ" वाले भाव से प्रेरित..

इनकमिंग फ्री - पंकज त्रिवेदी

मेरी "लाल रंग का फ़ोन" पर मित्र पंकज त्रिवेदी की कमेन्ट के रूप में लिखी गई कमाल कविता..
बचपन में देखा था मैंने लालजी बनिए के वहां एक फ़ोन
"लालजी फ़ोन वाला" जवाब होता था
जब पूछा जाता था लालजी कौन?
फ़ोन आने से पहले लालजी एक सामान्य दुकानदार था
ग्राहक उधार खा के जाते और लालजी को डांट भी पिलाते

पर फ़ोन आने से मैंने लालजी का रुतबा बांस की तरह बढते देखा

उधार कम और नकद ज़्यादा हो गया
डांट खत्म और सम्मान पैदा हो गया
क्योंकि अब लालजी सिर्फ दुकानदार नहीं
कईओं का राजदार था
उसके फ़ोन के ज़रिये होता था प्यार
प्यार का व्यापार
व्यापार का प्यार

उसके फोन पे हंस हंस के बाते करने वाली

और
हमें देख मुंह फेरने वाली हर लड़की चरित्रहीन होती थी
विश्वसनीय सूत्र बताते थे कि ऐसी लडकियां
सुबह फ़ोन पे बात करती थी
और
दोपहर में अपना चरित्र खोती थी
ये अलग बात है कि वो सारे विश्वसनीय सूत्र
उन लड़कियों के हाथों करारे चांटे खा चुके होते थे

उनमे से एक थी "वो"

पता नहीं कौन था जिससे "वो" इतनी बाते करती थी??
उस अनदेखे अनजान सामने वाले के लिए
बस्ती के हर जवान दिल पे "वांटेड" का पोस्टर छप चुका था
क्योंकि हरेक लड़का "वो" पाने के लिए हजारों जाप जप चुका था

अगर सामने वाला "हम" में से कोई होता

तो बस्ती के लोग अब तक उसकी तेरहवीं का खाना खा चुके होते
पर नहीं
"सामने वाला" कोई बाहरवाला था
जो हमारी "वो" को हमसे पहले बिगाड़ रहा था
आखिर एक दिन फोन पर हंस हंस के बात करती रूपा का पीछा किया गया

रूपा रंगे हाथ पकड़ी गयी
"सामने वाले" के साथ

रूपा के नंगे बदन को घूरते हुए
"मार डालो इस वहशी को"
"उम्र का लिहाज तो करता"
"दूकान जला डालो, मुंह काला कर दो"
जैसे वाक्य चिल्लाते हुए हम सब कब

"अरे लड़की ही कुलटा है"

"इसे ही मज़े का चस्का है तो कोई और क्या करे"
"अरे बेचारे लालाजी कहाँ गंद में फंस गए"
बोलने लगे
पता ही नहीं चला
क्यूँ???

क्योंकि किसी ने नौकरी की एप्लीकेशन में

किसी ने अपनी माशूका को
किसी ने रिश्तेदारों को
किसी ने गाँव में अकेली पत्नी को
किसी ने विदेश गए पति को
किसी ने अपने बॉस को
किसी ने अपने दोस्त को
लालजी बनिए का ही नंबर दिया हुआ था

इस घटना के बाद पुनः प्रतिष्ठित लालजी ने

जो पहले फोन आने पर भी हम सबसे पैसे लेता था
पैसे लेने बंद कर दिए
हमारा "इनकमिंग फ्री" करके उसका "आउट-गोइंग" जारी रहा

और सालों तक लालजी की दूकान पे लालजी से

"शिलाजीत के कमाल" के किस्से सुनते हुए
हम सब राह देखते रहे
इंटरव्यू के
प्रेमिका के
बॉस के
बछड़ा पैदा होने के
गाय मरने के
ऐसे वैसे कई तरह के
फ़ोनों की.......

पंकज त्रिवेदी

हमें शक्ति देना प्रभु -अश्वनी

मुझे साधारण लिखना है
इतना साधारण कि 
जब मेरा दिमाग कुंद हो जाए और दिल कमज़ोर
मैं तब भी अपने लिखे को समझ पाऊं

मैं इतना साधारण लिखना चाहता हूँ कि
बोझा उठाने वाला मज़दूर
मल्टी नैशनल कम्पनी का ऑफिसर
रेड लाइट एरिया की औरतें
कॉलेज के छात्र 
दुकानदार वेटर ठेलेवाले 
सब एक बार में समझ पाएं
सबको लगे कुछ अपना सा 
कुछ उनके दिल की बात

पर इतना साधारण भी नहीं लिखना मुझे
कि उसको समझ जाएँ भ्रष्ट वाले नेता
दोगले टाइप दलाल
सड़े हुए सूदखोर 
ज़ालिम जैसे पुलिसवाले 

जब तक मेरा लिखा
ऐसे लोगों से बचा रहेगा
तब तक बचा रहूँगा मैं
बची रहेगी मेरी कलम में स्याही 
बची रहेगी एक आस
मज़दूर वेश्या दुकानदार छात्र वेटर ऑफिसर ठेलेवाले 
के दिल में

हमें शक्ति देना प्रभु !!!

लाल रंग का फ़ोन - अश्वनी

मेरे पास एक हिंदी किताब है
मैं आँखें बंद कर उसे खोलता हूँ
किसी एक शब्द पे उंगली रखता हूँ
वो शब्द है.....फ़ोन

मैं आज इतना बुझा हूँ कि कुछ लिख के
खुद को जगाना चाहता हूँ
कोई कविता भाव या संवेदना दस्तक नहीं दे रहे
इसलिए आज के लिए मैंने एक खेल चुना है
जो शब्द मेरी उंगली के नीचे आएगा
मैं उसको ले के कुछ लिखूंगा

जब मैंने अपनी ज़िन्दगी का पहला फ़ोन घुमाया था
तो रांग नंबर लगा था
एक निहायत भूखे बच्चे को जैसे ढेर खाना मिल जाए
और वो इतना ठूंस ले कि सांस लेनी मुश्किल हो जाए
उसी तरह एक शादी समारोह में एक फ़ोन पा गया था मैं
एक दम अकेला आमंत्रण देता लाल रंग का फ़ोन
बड़ों को जो करते देखा था..वही करने लगा मैं भी
चोगा कान से लगा
उँगलियों से कुछ भी नंबर घुमाने लगा
अचानक कान में हैलो हैलो की आवाजें आई
और मेरा चेहरा पीला पड़ गया
दिल बूम बॉक्स की तरह बजने लगा
मुझे लगा कि आज पिटाई पक्की
मैं फ़ोन छोड़ के भागा
उसके बाद मैंने पेट दर्द का बहाना बना के
डैडी को जल्दी घर लौटने पे मजबूर किया

वो पेट दर्द मुझे कई दिन तक होता रहा
मुझे डर था चोरी पकड़े जाने का
इसलिए दर्द के पीछे छुपा रहा था मैं अपना डर
इस घटना के काफी सालों बाद हमारे घर पे भी फ़ोन लगा
पर इसमें उंगली फंसा के नंबर घुमाने वाला इंतजाम नहीं था
और इसका रंग भी काला था
काला कौआ कहीं का
पता नहीं क्यों
मैं अपने घर के फ़ोन को कभी पसंद नहीं कर पाया
वो लाल रंग का फ़ोन अब भी मेरे सपनों में आता है  

February 25, 2012

चाहत - अश्वनी

मिटना नसीब था
तुझपे मर मिटे

खुद को पाना था

तुझमें खो गए

इज़हारे मोहब्बत था

ज़ुबान खामोश रही

तू साया बन साथ थी

मैं अंधेरों में था
साया दिखा नहीं
महसूस हुआ

जब तूने बहुत देर थामे रखा हाथ

लकीरें बदलने लगीं
'अकेलेपन' की जगह
तेरा नाम उभर आया

तूने इतने समर्पण से मुझे चाहा

मुझे मोहब्बत पे यकीन होने लगा
तूने मुझे देखा 'उस' नज़र से
मुझे खुद पे यकीन होने लगा

जब तू आई जीवन में

मैंने एक बड़ा छाता खरीदा
अब से पहले एक छोटी छतरी बारिश के लिए थी

तेरे आने से

मैंने पहली बार जानी बहुत सी बातें
मैंने जाना कि
मैं खुद से ज़्यादा भी चाह सकता हूँ किसी को
खुद से ज़्यादा तुम पर भरोसा करता हूँ

तेरे आने से

बारिश,हवा,पहाड़,बादल,चाँद,घाटी,वादी,झरना,जंगल
जैसे शब्द
परिभाषित हुए

अब तुम अपना ज़्यादातर वक़्त मेरे संग बिताती हो

बंद आँखों से भी दिख जाती हो
आँखें खोलूँ
तब भी रहना सामने
हमेशा

February 23, 2012

साली ख़ुशी - अश्वनी

जब मुझे मेरे भीतर के भाव समझ नहीं आते
वो समय बहुत कठिन गुज़रता है मुझ पर...

जिसे मैं ग़ुस्सा समझ पी जाता हूँ
उसका स्वाद निराशा सा निकलता है
जिसे मैं निराशा समझ झटक देता हूँ
वो दरअसल कोई दबी कुंठा होती है
या मेरा इन्फीरीऑरिटी काम्प्लेक्स
जो कूबड़ की तरह लदा रहता है पीठ पर
कूबड़ को कोई झटक पाया है आज तक

जिसे मैं ख़ुशी मान झूमता हूँ
वो अक्सर शराब का नशा होता है
पैर थिरकते हैं
चेहरा मुस्कुराता है
दिल एब्सेंट माइंडेड सा डोलता है इधर उधर
दिल शरीक ना हो तो वो ख़ुशी हुई क्या

जिसे मैं अवसाद यानी डिप्रेशन मान दिनों-दिन पड़ा रहता हूँ बिस्तर में
वो किसी की याद निकलती है
अवसाद का रूप बना कर मुझे छलने आई छलना
मेरा सब कुछ लूट ले जाती है लुटेरी
ऐसी याद से तो मेमोरी लॉस भला

जिसे मैं चिंतन समझ के डूबा रहता हूँ सोच में
वो अक्सर होता है मेरा पलायन
सब से कट के अकेले में मुस्कराहट रहती है लबों पर
कभी कोई नगमा भी गुनगुनाने लगता हूँ मैं
दिल दोस्त सा साथ रहता है उन लम्हों
मेरा चिंतन पलायन असल में वेश बदल के आई ख़ुशी है
मेरे लिए बेहतर है कट के रहना

ये भाव भी बड़ा भाव खाते हैं
जैसे होते हैं
वैसे दिखते नहीं
जैसे दिखते हैं
वैसे होते नहीं
पर 
सौ बातों की एक बात

ख़ुशी आती रहे
चाहे हज़ार वेश बदल
सब रूप क़बूल उसके...

February 22, 2012

सपना उर्फ़ मेरी प्रेमिका - अश्वनी

एक सपना सता रहा था मुझे
पिछले कुछ दिनों से
एक धारावाहिक के रूप में ये सपना घटित हुआ है मेरी नींदों में...
पहले दिन एक लड़की पैदा हुई कहीं

दूसरे दिन वो लड़की बड़ी हुई
तीसरे दिन वो जवान हो गयी
जवान हुई तो पता चला कि मैं इस लड़की से प्यार करता हूँ...
पर चौथे दिन वो लड़की अधेड़ हो गयी मेरे सपने में
पांचवे दिन उसको घेर लिया कई तरह की बीमारियों ने
छठे दिन वो बूढ़ी जर्ज़र हो गई
सातवें दिन वो बिस्तर से लग गई
बस....
आठवें दिन से मैंने नहीं ली है एक भी झपकी
मुझे डर है और पक्का यकीन भी है कि
इस बार के सपने में मेरी प्रेमिका ले लगी मुझसे विदा सदा के लिए....
तब से ले के अब तक कई दिन बीत चुके हैं
और मैं अनिद्रा के अनशन पर बैठा हूँ
पानी के छींटे, कॉफ़ी, और नींद भगाने  वाली दवाइयों से मैंने नींद को दूर भगाया हुआ है..
इतना कुछ आपसे बांटने के बाद मेरे कुछ सवाल हैं
क्यूँ आते हैं सपने?
क्यूँ कोई लड़की बन जाती है प्रेमिका?
क्यूँ जाते हैं लोग?
क्यूँ किसी के जाने से इतना डरता है मन?
क्यूँ इतने सवाल हैं ज़िन्दगी में?
क्यूँ कुछ लोग सोते नहीं चैन से?
और मुझे भी नहीं सोने देते चैन से?

February 19, 2012

ग़ुलाम राजा- अश्वनी

देह मानचित्र सी
अपनी अपनी जगह घेरे अंग प्रत्यंग
स्वामी दिल
प्रहरी मस्तिष्क
शिराओं सी नदियाँ जोड़ती सबको परस्पर...

कोई आके तोड़ दे ये
व्यवस्था
अस्त व्यस्त कर दे मानचित्र
झुलसा दे देह
दमका दे देह
निखरा दे देह
सुला दे प्रहरी को
नदियों को डुबो दे पाताल में
और
स्वामी को बना ले अपना ग़ुलाम....

'उसकी' ग़ुलामी में दिल बल्लियों उछलता है
अहम् टूटता है तो वहम बिखर जाता है
हर दिल की कोई एक रानी
कोई एक राजा होता है..
दिल ग़ुलामी में हरदम जवान रहता है...

'स्वामी दिल' अकेलेपन का शिकार होता है
जल्दी बुढ़ा जाता है
अहम् वहम उसको झुकने नहीं देते
तनी अकड़ी गर्दन एक दिन भरभरा के ढह जाती है...

उम्र बीतने पे आई समझ, नासमझी है
जिनके पास अभी भी वक़्त बचा है
वो मेरे अनुभव से लाभ पाएं
दिल को किसी का ग़ुलाम बनाएं
इस बाज़ी में शह से ज़्यादा मज़ा मात में आता है
हथियार उठाने से
अधिक सुखद है समर्पण
तन-ने से बेहतर है बिछ जाना
अकड़ से अच्छी है पकड़...

इसलिए यहाँ कवितायें पढ़ने में समय ना गँवा के
कविता को खोजो
या
स्वयं बन जाओ कविता...

February 18, 2012

भोला दिल - अश्वनी

घर घर जा के हिंदी साहित्य की किताबें बेचता
कंधे पे टाँगे झोला
वो भोला..
मुंबई में सिर्फ खाने और शराब की होम डिलीवरी ही नहीं होती..
एक फ़ोन पे साहित्य भी घर आता है..
10 % की छूट पे..
हर बार सोचता हूँ एक-दो से ज़्यादा किताबें नहीं लूँगा..
क्योंकि भरा है घर पहले ही अत्यधिक किताबों से..

किताब रखने की जगह नज़र ही नहीं आती..
पर हर बार भोले का झोला आधा खाली हो जाता है..
और घर में जगह निकल आती है किताबें रखने की..
दरअसल यह जगह पहले मेरे दिल में बनती है..
फिर मेरा दिल बना लेता है थोड़ी जगह घर में भी..
दिल के अनोखे तहखाने हैं
जितने खोलो
उतने बढ़ते जाते हैं..
मेरा दिल मेरी सोच समझ को चित कर देता है
हमेशा...

February 17, 2012

यात्रा पात्र - अश्वनी

पिछली 6 फरवरी से 15 तक एक यात्रा में था..
इन 10 दिनों में खूब पैदल चला..
घूमने लायक जगहों पे घूमा..
लगभग हर रोज़ सुबह जल्दी उठा..
शाम थक के मालिशें करवाई..
तरह तरह की बीअरें पी..
झींगा,केकड़ा,बड़ी छोटी मछलियाँ
और तरह तरह के मांसाहारी शाकाहारी खाने खाए..
स्वादिष्ट अनोखे फल खाए..
बकरी का बोतलबंद दूध भी पीने मिला..
कभी तीखी मिर्ची से जीभ जलाई
कभी फल मिश्रित आइसक्रीम से ठंडक पाई..
सब था पास..
पर तीसरे चौथे दिन से ही घर की दाल रोटी बेतरह याद आने लगी..
मैं थाईलैंड में था.. 

February 5, 2012

करता क्यों ना मरता ? - अश्वनी

अधमुंदी आँख
बोझिल तन
घायल मन
दिमाग चौकन्ना

कर्मठ मैं
बढ़ते कदम
सामने मंजिल
दिल उदास

भरी जेब

खनखन सिक्के
बैंक बैलेंस
हाथ खाली

भरा परिवार

होम स्वीट होम
सब सुख
सब में तन्हा

नरम बिस्तर

धुली चादर
गागर में सागर
करवट रात

प्रशंसा भरपेट

उज्जवल भविष्य
बढ़ते आलिंगन
अछूती आत्मा

बाधा दौड़

निपुण धावक
गोल्डन ट्रॉफी
पस्त विचार

छप्पन भोग

लपलप जीभ
मुंह में पानी
मरी भूख

लम्बी गाड़ी

कॉस्टली शोफर
टंकी फुल
टायर पंचर

उत्साह जीवन

आँखों सपने
रेल ज़िन्दगी 

अझेल ज़िन्दगी

बिकता लेखन

डेली सोप
जम के पैसे
कौन कविता ?

दिमाग चौकन्ना
दिल उदास हाथ खाली सब में तन्हा करवट रात अछूती आत्मा पस्त विचार मरी भूख टायर पंचर अझेल ज़िन्दगी कौन कविता?

सुसाइड नोट.......
मुंह से झाग........


नोट- ऊपर लिखी सब घटनाएं काल्पनिक हैं..इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है..यदि आपको किसी के भीतर ऐसे लक्षण दिखें..तो वो महज़ एक संयोग है..

February 4, 2012

हर बार कविता नहीं होती - अश्वनी

अभी मैं कहने जा रहा हूँ कुछ ऐसी बातें 
जो बिलकुल साधारण हैं..
ऐसी बातें हर किसी के ज़हन में आती हैं..
ऐसे शब्द..ऐसी सोच..हर किसी के पास होती है..
इसमें कुछ भी नहीं है कविता जैसा..
पर धोखे से मंच पे चढ़ आए कवि की तरह 
अपनी बात कहके ही जाऊँगा..

काम में दिन रात डूब के पार उतरना निर्वाण है..
किसी को मोहब्बत में पा जाना खुदाई है..
लम्बी दौड़ में सुस्ताना रूहानी है..
प्यास में पानी अमृत है..
भूखे को रोटी जहान है..
धूप में साया सुकून है..
ना के बाद हाँ आनंद है..
यथार्थ में सपने प्राण हैं..
जीवन बाद मौत शान्ति है..
तेरे बिना जीवन मौत है..

देखा..मैंने कहा था ना
इसमें कुछ भी नहीं है कविता जैसा...

February 1, 2012

नो कविता डे - अश्वनी

जब मैं कवितायें लिख रहा होता हूँ तो समझ जाइए 
कि मैं उन दिनों में एक भी पैसा नहीं कमा रहा हूँ..
जब कविता पास होती है तो पैसा दूर भागता है...
जब पैसा कमाता हूँ तो कविता पास नहीं आती..
हालाँकि मैं लिख के ही पैसा कमाता हूँ..
पर वो लिखना अलग होता है..
उसमे सब कुछ होता है..
पर कविता नहीं होती..
मैं आजकल फिर से पैसा कमाने के लिए लिख रहा हूँ..
और कविता दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रही..
एक ही सवाल है मेरा आजकल..
ये लक्ष्मी और सरस्वती कभी हाथ मिलायेंगी क्या??

January 30, 2012

मेरे सवालों का जवाब दो..दो ना - अश्वनी

क्या आपको पता है?
केवल कॉकरोच रहेंगे जिंदा..
जब सब होंगे मुर्दा..

पर उस वक़्त क्या जिंदा होगा सच?
या झूठ बोल रहे होंगे कॉकरोच भी?
उस वक़्त भाई,भाई का गला काटेगा??
या वो सीख जायेंगे भाईचारे से रहना?

उस वक़्त भी क्या रूपया होगा सबका बाप?
या कॉकरोच बेकाम की वस्तु समझ के नकार देंगे उसको?
क्या उस वक़्त हो रहे होंगे प्रोपर्टी के झगड़े? 
या कॉकरोच मिल के रह रहे होंगे एक ही भूखंड पे?
उस वक़्त क्या हो रही होगी इन्फिडेलिटी?
या कॉकरोच सीख जायेंगे मोनोगैमी?

क्या उस वक़्त तक कॉकरोच समझ चुके होंगे कि 
इंसान था अजीब प्राणी..
जो जिंदा था..लड़ता था..मरता था..और मर गया..
ज़र जोरू ज़मीन पे... 

जो बात कॉकरोच समझेंगे हमारे जाने के बाद..
हम वो बात जीते जी समझ लें?
मैं सवाल बहुत पूछने लगा हूँ आजकल..
मुझे माफ़ करना..
पर जब बरसों से जवाब ना मिलें हों तो बहुत से सवाल हो जाते हैं इकट्ठा..

January 29, 2012

सोच लो - अश्वनी

इतनी भीड़ इतने लोग इतने चेहरे इतने चरित्र 
भगवान के पास मिट्टी है अनंत..
पर ओवरटाइम करना पड़ रहा है उसको भी
दिन रात काम में जुट के भी सप्लाई पूरी करना हो रहा है मुश्किल..

डिमांड बढ़ती ही जा रही है..
सबसे ज़्यादा आर्डर इंडिया से आते हैं..
क्वांटिटी के चक्कर में क्वालिटी गिर रही है..
औसत दर्जे के भारतीय बनाने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं.. 
अव्वल दर्जे के लिए लगता है धैर्य और समय 
पर ना नीचे समय है लोगों के पास..
ना ऊपर उसके पास..

कई बार तो किसी विशेष तिथि को अचानक ओवरलोड हो जाता है कारखाना..
11.11.11 या 12.12.12 जैसी तिथियों पे पैदा होने के लिए नीचे मचती है होड़..
तमाम कुदरती गैर-कुदरती तरीकों से लाये जाते हैं नवजात दुनिया में..
उस दिन ऊपर पानी पीने की फुर्सत भी नहीं मिलती उसको..
उन दिनों में शायद वो हायर करता है थोड़े कम अनुभवी देवता..
जो जैसे तैसे गढ़ कर भेज देते हैं पुतले..

अबे इंसानों..
इतना ज़्यादा काम लोगे बेचारे से तो एक दिन सब्र का प्याला छलक जाएगा उसका..
उस दिन वो उठा के बहा देगा सारी मिट्टी..
तोड़ने लगेगा अपने बनाए मिट्टी के पुतले..

एक अफवाह भी गरम है कि दुनिया खत्म होने वाली है..
मैं डरा नहीं रहा,चेता रहा हूँ
सोच लो.. 

कुदरत - अश्वनी

बारिश में नहाए बहुत दिन हुए..
तन मन भिगोए बहुत दिन हुए..
सराबोर हो छींक मारे बहुत दिन हुए..
भीगे तन में चाय चुसके बहुत दिन हुए..
जबसे रहने लगी छतरी संग-संग..
बारिश का उड़ गया रंग.. 

आंधी देखे बहुत दिन हुए..
धूलम-धूल हुए बहुत दिन हुए..
नैचुरल पाउडर लगाए बहुत दिन हुए..
कपड़े झाड़े बहुत दिन हुए..
जब से चढ़ गया आँखों पे चश्मा..
आंधी का हुआ खात्मा..

जाड़ा पाला महसूसे बहुत दिन हुए..
हाथ जेबों में घुसाए बहुत दिन हुए..
आग तापे बहुत दिन हुए..
दांत किटकिटाये बहुत दिन हुए..
जब मोटी हो जाए खाल..
जाड़े का कहाँ सवाल..

बारिश आंधी जाड़ा लू हिमपात बसंत पतझड़ 
इनको देखने जानने सुनने महसूसने 
खुद को मिटाना होगा

अपने आप से नज़र हटेगी..
तभी तो कुदरत दिखेगी..

January 28, 2012

चलें?-अश्वनी

धुंध के पार..चलोगी मेरे साथ?
रोशनी पे सवार..चलोगी मेरे साथ?
मुश्किलें हैं तैयार..चलोगी मेरे साथ?
सह हर वार..चलोगी मेरे साथ?
पूँजी केवल प्यार..चलोगी मेरे साथ?
काँटों भरी बहार..चलोगी मेरे साथ?
न मोटर न कार..चलोगी मेरे साथ?
रोटी विद अचार..चलोगी मेरे साथ?
संघर्ष मेरा संसार..चलोगी मेरे साथ?
विजेता हो, अब सब हार...चलोगी मेरे साथ?

दिन गिनती के चार..चलो ना मेरे साथ..
मुझे करती तो हो प्यार..चलो ना मेरे साथ..
मुझे आता रोज़ बुखार..चलो ना मेरे साथ..
सीने पार कटार..चलो ना मेरे साथ..
गिरा दी हर दीवार..चलो ना मेरे साथ..
खूब करेंगे प्यार..चलो ना मेरे साथ..
दिल में बजी गिटार..चलो ना मेरे साथ..
ग़लती की स्वीकार..चलो ना मेरे साथ..
इन्तहा हुआ इंतज़ार..चलो ना मेरे साथ..
मान जाओ ना यार..चलो ना मेरे साथ.. 

जंगली- अश्वनी

मुझे जंगल देखे कई दिन हो गए
मैंने कई दिन से अपने भीतर नहीं झाँका
काई जम गयी है वर्षावन में
मेरे मन में...

एक वन-नदी तोड़ चुकी है सांस
सूखी पपड़ी सी पड़ी है मुर्दा
मछलियों के कंकाल मुकुट से सजे हैं पपड़ी पर
मेरी धमनियों का रक्त जम के हो चुका है काला
मेरी शिरायें सूखे नूडल सी लटक रही हैं
त्वचा से बाहर झाँक रही हैं नसें

कांटे उगे हैं जगह-जगह जंगल में
छील देते हैं जो
लील लेते हैं जो
मेरी जीभ रेगमार हो गयी है
जख्म देती है
घायल कर देती है
कभी तुझे, कभी मुझे

सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता इस अरण्य में
इतना घना है ये
मेरी आत्मा को कोई छू नहीं पाया अभी तक

विषैले-वनैले जीव-जंतु भरे पड़े हैं इस कानन में
छेड़ते ही काट लेते हैं
मेरी हस्तरेखाओं में वध की पुष्टि हुई है

जंगल में आग लग गयी एक दिन अचानक
सारे वन-कानन पे कालिख पुत गई
अरण्य नगण्य हो गया
उस रात मेरे हाथ से कुछ लकीरें गायब हो गईं
मन हर्षित और वाणी मधुर हुई मेरी
मुझे कोई लगने लगा बेहद प्यारा
मैं उसी के साथ जंगल-सफ़ारी पे जाने वाला हूँ।

January 27, 2012

राजकुमारी की कविता-अश्वनी

कवितायें पढ़-सुन कर मेरी
एक देश की राजकुमारी हो गयी फ़िदा...
विवाह का आदेश आया सन्देश के रूप में..
ऑफर अच्छा था..
विवाह करने पे राजकुमारी के साथ राज-पाट भी मिलेगा..
P.T.O लिखा था सन्देश के कोने में..
पलट के देखा तो एक शर्त भी चस्पां थी..
शर्त थी कि मुझे हर रोज़ सुनानी होगी एक कविता राजकुमारी को..
सन्देश और शर्त दोनों आदेश थे..
सो मान लिए..
विवाह हुआ..कविताई भी शुरू हो गयी..
राज-पाट मिला..
सीधा-सादा सा मैं तीर सा तन गया..
सर झुके नौकर से अकड़फूं राजा बन गया..
जब सत्ता सर चढ़ने लगी तो कविता दिल से उतरने लगी..
एक कविता कहना एक समंदर लांघने जैसा हो गया..
इसी राजमद की भूल-भुलैयां में एक दिन मैं बिना कविता कहे सो गया..
सुबह मुझे ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया राजकुमारी ने..
अगले दिन से राजकुमारी कवितायें पढ़ने-सुनने लगी नए कवियों की
सुना है उसे एक नए कवि की कवितायें पसंद आने लगी हैं..
राजकुमारी के कारिंदे एक नयी दीवार के लिए ईंट-गारा जुटाने में लग गए हैं..

भूत-अश्वनी

हर तरह की यादों का एक वक़्त और दिन होता है..
आज मैं फुर्सत में हूँ
और मुझे अपने बचपन की
पुराने दोस्तों की
छूट गए छोटे से कस्बे की
उस छोटे से कस्बे में हमारे बड़े से घर की
यादें घेरे हुए हैं...

जब मैं भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में होता हूँ 
तब इस तरह की नॉस्टैल्जिक टाइप 
यादें मेरा साथ छोड़ देती हैं..
तब मुझे याद रहता है 
मिल्खा सिंह से भी तेज़ भागता समय
और सुरसा-सा मुंह फाड़े बचा ढेर काम...
भविष्य बेहतर करने में वर्तमान बर्बाद करना 
मैं कभी नहीं भूलता उस समयकाल में...

उस वक़्त मेरा मशीनीकरण हो चुका होता है...
मेरे पूरे जिस्म पे नट-बोल्ट उगे जाते हैं
और मेरा बॉस पेचकस हाथ में ले के 
कुटिल मुस्कान लुटाता है..
ज़रा सा भी ढ़ीला पड़ने पे 
वो मेरे पेच कस देता है..

उस वक़्त मुझे याद कराने पे भी याद नहीं आता कि
मैं कभी बच्चा भी था..
और मैं कहता पाया जाता हूँ 
कि मेरे कभी कोई दोस्त ही नहीं रहे

उस वक़्त मुझे यकीन होता है 
कि मैं जन्म से ही इस महानगर में हूँ..
और यह दड़बेनुमा घर ही मेरा घर है सदा से..

उस वक़्त अगर मुझे दुनिया के मानचित्र से मिटा दिया जाए
मतलब मेरी हत्या हो जाए 
या फिर स्वाभाविक मौत
तो
किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा..
सिर्फ़ मेरे बॉस को थोडा दुःख होगा 
समय की हानि होने का..
उसे एक दिन का अवकाश रखना पड़ेगा मजबूरी में..

किन्तु एक दिन बाद
कोई छोटे कस्बे के बड़े घर से आया 
लड़का
जिसके कई दोस्त हैं
और जो अभी भी बचपन, कस्बे
और दोस्तों को याद करता है...
मेरी जगह ले लेगा..

फिर मेरा बॉस उसको बताएगा
की उससे पहले उसकी जगह काम करने वाला
हमेशा खोया सा रहता था कुछ यादों में
इसलिए वो नहीं कर पाया
अपना काम सुचारू रूप से..
अगर ऊपरवाला उसको निकाल के न ले जाता
तो वो खुद ही उसे निकालने वाला था नौकरी से..
इसलिए बेटा...याद रखना..
यादों में मत खोना यहाँ..
दिल लगा के, नज़र झुका के काम करना..
उसके बाद तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है..

जिस वक़्त मेरा बॉस 
मेरे जैसे एक छोटे कस्बे से आये 
नए लड़के को ज्ञान पिला रहा होगा..
उस वक़्त मैं भूत बनके 
अपने छोटे से कस्बे के बड़े से ख़ाली पड़े घर में 
अपने पुराने दोस्तों को याद करके भटक रहा होऊंगा...

January 25, 2012

हूम हूम दिल-अश्वनी

इस कविता में हैं
कुछ छोटी-छोटी कवितायें...
किसी का किसी से 
कोई सीधा सम्बन्ध नहीं..
सिवाए इसके कि...
यह सब मेरे दिल की आवाजें हैं..

प्रेम को रजाई सा ओढ़ा...
गर्माहट से भर गया अंतस..
रजाई ओढ़ के जीवन बिताना....
नामुमकिन है...

एक उधेड़बुन साथ है आत्मा के..
हर समय सालती..
यह उधेड़ बुन...
आत्मा को उधेड़ देती है...

अपनी बचपन की तस्वीर देख के...
अक्सर ये होता है..
खुद को आईने में देख के..
अच्छा नहीं लगता...

माँ ने अब तक
मेरे बचपन के कपड़े संभाल रखे हैं..
वो एक बार मेरे बच्चों को...
वो कपड़े पहने हुए देखना चाहती है..
क्या मैं भी संभाल के रखूंगा 
अपने बच्चे के बचपन के कपड़े?
पता नहीं क्यूँ...
पर मैं एक बार
माँ से लिपट के खूब रोना चाहता हूँ...

मेरे पिता 20 साल बूढ़े हो गए हैं पिछले 10 सालों में..
उनकी बूढ़ा होने की दर
दोगुना हो गयी अचानक...
पिता को अपनी आँखों के सामने 
अपने बच्चे को बढ़ता देखना भाता है..
पर बढ़ चुके बच्चे के लिए
पिता को बूढ़ा होते देखना विवशता है..
मैं एक बार अपने पिता को 
यह बोलना चाहता हूँ कि
मैं उन्हें बेहद प्यार करता हूँ...

मेरा भाई मेरा दोस्त है 

वो वैसा दोस्त है 
जो भाई जैसा होता है...
वो घुमक्कड़ है..
मैं उसके साथ
एक लम्बी यात्रा पे जाना चाहता हूँ...

जब पत्नी मेरे दुःख से दुखी
और मेरे सुख में सुखी होती है
तो अक्सर सोचता हूँ
कि यूँ ही अर्धांगिनी नहीं कहते उसको...
अर्धांग बनके वो...
करती है मुझे पूर्ण..
मैं उस से पहले या उसके साथ
इस दुनिया से जाना चाहता हूँ..
मुझसे पहले उसका जाना मैं नहीं देख पाऊंगा...
कसम से...

January 24, 2012

सपनों से भरे नैना..न नींद है न चैना-अश्वनी

अगर मैं अपने सपनों की रिकॉर्डिंग कर पाता..
तो मैं आज एक बहुत बड़ा कहानीकार..उपन्यासकार,कवि होता..
सपनों में इतनी कहानियाँ..इतनी कवितायें रचता हूँ कि सपने में मुस्कुराता रहता हूँ..
कभी-कभार कोई कहानी आ के रुला भी जाती है..कोई हंसा जाती है..कोई डरा जाती है..
पर कहीं न कहीं मुझे पता चल जाता है कि यह एक सपना है..
तो मैं मुस्कुराने लगता हूँ..
क्योंकि मुझे पता होता है कि मैं रच रहा हूँ कोई बड़ा साहित्य..
बस केवल एक रहस्य मैं नहीं जान पाता सपने का..
कि जो मैं रच रहा हूँ..यह सब एक जादुई स्याही से लिखा जा रहा है...
जो स्याही सुबह होते ही गायब हो जायेगी मेरी याद के पन्नों से..
ज्यादा सोचते रहने का नतीजा है यह सारा..
दिन भर सोचो और रात में सपने देखो..
पेट भर सपनों से भरी नींद साउंड स्लीप नहीं होती..
मेरे सपने मेरी नींद खा गए हैं पिछले कुछ सालों से..
मैं साहित्यकार तो नहीं ही बना..
हाँ..अनिद्रा का शिकार हो गया हूँ..
अब केवल एक तमन्ना है..
या तो सपने रिकॉर्ड होने लगें..

या सपने समाप्त हो जाएँ..
या मैं सोचना बंद कर दूं..
या....

January 22, 2012

मैंने खुद को देखा-अश्वनी

बंद कमरे में घुसा मैं घरघुसरा अँधेरे में भी देख लेता हूँ आजकल..
बाहर धूप और रोशनी है..इसका इल्म है मुझे..
कल्पना में मैं दरवाज़ा लांघ के बाहर पहुँचता हूँ..
धूप को अपनी मुट्ठी में कैद करता हूँ..
जब जब मैं ऐसा करता हूँ तो..
घर के भीतर मेरी हथेली पता नहीं क्यूँ गरम हो जाती है..
घर के भीतर मैं अकेला हूँ..
मैं घर के बाहर नहीं हूँ..
कल्पना एकमात्र पुल है मेरे और बाहर के बीच..
मैं भीतर बैठा अपने को बाहर देख रहा हूँ..
मैं एक भूखे भिखारी बूढ़े के पास खड़ा हूँ..
मैंने उसके हाथ में चार रोटियाँ और आलू गोभी की सूखी सब्ज़ी रखी..
शाम को खाना खाने रसोई गया तो चार रोटियाँ और आलू गोभी की सब्ज़ी गायब मिली...
भूखे आदमी को गुस्सा ज्यादा आता है..
मैं भूखा था और खूब गुस्से में था..
मुझे लगा कि मुझे खुद को खुद की कल्पना में देखना नहीं चाहिए था..
अगर वास्तविकता में होता तो मैं खुद भूखा रह के किसी दुसरे भूखे का पेट कतई नहीं भरता..
ज़्यादातर ऐसा ही है..हमारा काल्पनिक रूप हमारे वास्तविक रूप से अधिक सुंदर है..
काश यह सब एक कल्पना लोक होता..फिर ना मैं घर के भीतर घरघुसरा बनके पड़ा होता..
ना मुझे अभी गुस्सा आ रहा होता..ना मुझे अपनी भूख इतनी ज़्यादा परेशान करती..
और ना ही कहीं कोई बूढ़ा भूखा भिखारी होता..और ना ही मुझे यह सब लिखना पड़ता..

और यदि आप जो यह सब पढ़के हल्की सी सोच में पड़ गए हैं शायद..
वो क्यूँ पड़ते भला...

January 20, 2012

क्यूँ से शुरू होते सवाल-अश्वनी

इतनी कशमकश..इतनी कसमसाहट..इतनी बेचैनी..इतना शोर..इतनी व्याकुलता..
क्यूँ कोई चैन सुकून आराम ख़ामोशी का दरवाज़ा नहीं खुलता?
क्यूँ धुकधुकी सी सीने में..क्यूँ रोज़ एक मरण रोज़ के जीने में?
क्यूँ चाह इतनी बढ़ी कि खुद छोटे नज़र आने लगे हम?
क्यूँ प्यास इतनी ज़्यादा कि सागर भी लगे कम?
क्यूँ पैर इतने बड़े कि हर चादर लगे छोटी?
क्यूँ स्वाद इतना सरचढ़ा  कि बेस्वाद लगे रोटी?
क्यूँ सीढ़ियों के चढ़ने में ज़िन्दगी उतरे जा रही कब्र में?
क्यूँ बेसब्री सबब बनी जीने का..क्यूँ मज़ा आता नहीं सब्र में?
क्यूँ प्रतिस्पर्धा घुल गयी खून में?
क्यूँ सर घूमता रहता व्यर्थ के जूनून में?
सबके अपने अपने सवाल हैं..सबके अपने अपने क्यूँ हैं..
मेरे भी बहुत से क्यूँ बचे हैं बाकी..
पर अभी इतने सारे क्यूँ से भरे सवाल पूछ कर मैं उदास हो गया हूँ..
मैं चला सोने..

January 17, 2012

चल कहीं दूर निकल जाएँ-अश्वनी

प्यार पर इतना लिखा-कहा-सुना जा चुका है...
अब मैं और क्या लिखूं ?
रिश्तों पर इतना देखा-सुना-पढ़ा है..
अब मैं और क्या कहूं?
भावनायों-जज्बातों की बातों का तो कहना ही क्या..
स्वेटर की तरह,एक सिरा पकड़ो तो पूरे के पूरे उधड़े नज़र आये हैं हमेशा..
मैं कौन से नए जज्बातों की करूं बात??
राजनीति,देश,गरीबी,शोषण,भ्रष्टाचार पे लिखने वाले हैं हज़ार..
मैं क्यूँ उनकी भेड़-भीड़ में हो जाऊं शामिल??
धर्म-कर्म,माया-मोह,लोभ-लालच,क्षोभ-कुंठा,पिपासा-वासना पे कह-कह के लोग थक ही नहीं रहे हैं..
और मैं इन पर लिखने के विचार से ही थक जाता हूँ..
जीवन-मरण,भगवान-शैतान,अच्छा-बुरा,खरा-खोटा,सच्चा -झूठा..
इसपे तो कोई भी कह लेता है आजकल..
मैं इसपे लिख के अतिसाधारण लोगों में क्यूँ लिखवाऊं अपना नाम?
यादें-वादे-इरादे,महबूब की बातें भी हो चुकी हैं खूब..
बड़े बड़े शायर कह गए हैं जो कहा जाना चाहिए था..
और जो कहने लायक था..
मैं अब निम्नस्तरीय लिख के उनके लिखे हुए को क्यूँ करूं शर्मिंदा?
इस धरती पर जो कुछ भी लिखे,कहे,सोचे जाने लायक था..वो हो चुका..
नए विषयो..नए विचारों,नए मुद्दों की तलाश में खोजने पड़ेंगे कुछ नए ग्रह..
या जाना पड़ेगा दूसरी दुनिया में..
जिसे स्वर्ग-नरक..जन्नत-जहन्नुम के नाम से मशहूर कर दिया है कुछ चतुर लोगों ने..
अब तो चिता पे लेट के कुछ नया सोचूंगा या फिर कब्र में उतर कर..

January 14, 2012

सुख की कविता-अश्वनी

मैं सुख की कविता लिखना चाहता हूँ..
आज तक नहीं पढ़ी कोई ऐसी कविता जिसमें सुख ही सुख हो..
हर कोई हो प्रसन्न..ख़ुशी से शुरू हो और ख़ुशी पे ख़तम हो जाए..
तेरे नाम से शुरू..तेरे नाम पे ख़तम टाइप्स...
पर जब ख़ुशी-ख़ुशी लिखने बैठा ख़ुशी और सुख पर कविता..
तो कविता अदृश्य हो गयी और एक गाना मेरे सर पे नाचने लगा..
मेरे पन्नों पे अब एक गीत लिखा है..
मैं अब भी एक सुख की कविता लिखना और पढ़ना चाहता हूँ..
ख़ुशी से शुरू..ख़ुशी पे ख़तम टाइप्स..

January 2, 2012

पुराना माल-अश्वनी

वही दोस्त,वही दोस्तियाँ..
वही मुश्किलें,वही कमजोरियां..
वही उलझाने,वही वादे,वही इरादे..
वही लालसाएं,वही इच्छाएं..
वही डर,वही संकोच,वही आशाएं,वही निराशाएं...
वही आप,वही मैं...
सालोंसाल से यह सालों का चक्र घूम रहा है..
सब कह रहे हैं की नया साल है..
मैं कहता हूँ नयी खाल पहन के यह वही पुराना माल है..

December 23, 2011

खुद की गर्मी से पिघला नज़रिया-अश्वनी

कई दिन से बुखार नहीं उतर रहा..
और मैं दार्शनिक होता जा रहा हूँ..
ये दर्शन स्वस्थ होने पर पास नहीं फटकता..
एक शेर रह रह के याद आता है इन दिनों..
इस सफ़र के वास्ते, इक रोग तू भी पाल ले..
सिर्फ सेहत के सहारे ज़िन्दगी कटती नहीं..
पर मेरे केस में उल्टा है..मैंने रोग को नहीं पाला
रोग ने मुझे पाल लिया है..
उंगलियाँ थर्मामीटर हो चुकी हैं..
खुद का ताप बता देती हैं खुद को छूते ही..
आँख मिचोली खेलता है बदन मेरा तापमान के साथ..
शांत रहने में मज़ा आता है..
दुनिया के लिए जो ज्वलंत मुद्दे हैं...
मेरे लिए बुझे कोयले हैं आजकल..
कोई अनशन पे बैट्ठे..
मेरे ठेंगे पे...
कोई संसद में चिल्लाए...
मेरे ठेंगे पे..
कोई काला धन वापिस लाये ना लाये..
मेरे ठेंगे पे..
एक बात तो है..जैसा भी है..जो भी है..
ये अवस्था अच्छी ही है...
खुद का बदन गरम हो तो गरम मुद्दे भी ठन्डे नज़र आते हैं..
आप क्या कहते हैं??

December 11, 2011

गाली-अश्वनी

रुका था तो चलने को तरसता था..
चला हूँ तो रुकने को तरसता हूँ...
क्यूँ सब कुछ सही अनुपात में नहीं मिलता साला...
भूखे थे तो खाने को तरसते थे..
इफरात में मिला तो भूख ही मर गयी साली..
ठण्ड में एक कपडे को तरसते थे..
गर्मी में रज़ाई ओढ़ा गए लोग साले..
एक बूँद पानी को तरसा दिया था कभी..
अभी नाक से पानी धकेल रहे हैं साले..
गाली देने का कभी शौक नहीं था मेरा कविता में..
पर आप ही बताइए..
ऐसी बीते किसी के साथ तो गाली न निकलेगी मुंह से साला..

October 30, 2011

शायद...अश्वनी

खाया पीया नाचा बहका..
चीखा चिल्लाया चम्भला चहका..
सुना सोचा सीखा दहका..
मना रूठा सोया महका..
पाया लिया दिया लहका..
क्यूँ बहका?
क्यूँ चहका?
क्यूँ दहका?
क्यूँ  महका?
क्यूँ लहका?
बिना वजह..
बेमकसद..
जैसा खिलाया..वैसा खेला..
जैसा रखा..वैसा रहा....
जैसा जिलाया वैसा जिया..
जब हाथ में मेरे कुछ भी ना था तो हाथ में मेरे लकीरें क्यूँ बनाई..
क्यूँ कहा तू ऐसा करेगा...वैसा करेगा..
कर कोई और रहा है..और भर कोई और रहा है...
सब के साथ ऐसा ही होता है..
शायद...

April 10, 2011

धारावाहिक - अश्वनी

ज़िन्दगी रोज़ाना टेलीकास्ट होने वाला चौबीस घंटे का धारावाहिक है 
यह टेलीकास्ट मेरे दिलो-दिमाग की स्क्रीन पे होता है
कभी कभार ही  कुछ एपिसोड्स देखने लायक होते हैं 
वरना..अक्सर वही घिसा पिटा 
हर वक़्त ये प्रयत्न के कुछ हो ऐसा
कि 
यह धारावाहिक बन सके देखने लायक
परन्तु
प्रयत्न..प्रतीक्षा का मज़ा ले लेता है 
ज़िन्दगी के इस डेली सोप में हाथ पे हाथ धर 
आराम कुर्सी पर बैठ  पोपकोर्न खाते हुए 
इस धारावाहिक की कड़ियाँ देखना ख़ास बुरा नहीं 
बशर्ते यदि आप अच्छे अभिनेता हैं
और 
खुद को मुख्य भूमिका में देख के बोर नहीं होते 
तो 
ये सारा जहान मंच है आपका
उछलिए कूदिये ठहाके लगाइए 
और सोच के खुश रहिए की आप निर्देशक भी हैं इसके
पर मेरा यह भ्रम खंडित है 
मैं ये स्वीकार करके जीता हूँ कि
एक कठपुतला हूँ मैं
किसी की उँगलियों में बंधी डोर से संचालित 
निर्देशक कई और हैं मेरे 
और वो सब मुझसे नाराज़ रहते हैं
क्योंकि मैं ज़िन्दगी के इस धारावाहिक में अच्छा अभिनय भी नहीं कर पाता..